मंगलवार, 17 अक्तूबर 2017

भावसार :भवानी भाई की ये कविता आपातकाल में तब लिखी गई थी जब इस देश की तमाम संविधानिक व्यवस्थाओं के ऊपर एक इंद्रा -जी पालती मारकर बैठ गईं थीं।महज़ अपनी कुर्सी बचाने के लिए इलाहाबाद उच्चन्यायालय के फैसले को धता बताते हुए तब उन्होंने जो सन्देश दिया था भारत के जन-मन को उसका खुलासा यह कविता बेलाग होकर करती है। यह वह दौर था जब तमाम छद्म मेधा उनकी हाँ में हाँ भयातुर होकर मिलाने लगी थी। लेकिन उस दौर में भी दुष्यंत कुमार और भवानी दा जैसे लोग थे जिन्होंने अपनी अस्मिता को बचाके रखा था और ये कविता दागी थी उस समय की दुर्दशा से संतप्त होकर:

बहुत  नहीं सिर्फ  चार कौवे थे काले ,उन्होंने ये तय किया कि सारे उड़ने वाले ,

उनके ढंग से उड़ें ,रुकें ,खाएं और गायें ,वे जिसको  त्यौहार कहें सब उसे मनायें  .

कभी -कभी जादू हो जाता  दुनिया में ,दुनिया भर के गुण दिखते हैं औगुनिया  में ,

ये औगुनिये चार बड़े सरताज हो गये  ,इनके नौकर चील गरुण और बाज़ हो गए।

हंस मोर चातक गौरैये किस गिनती में ,हाथ बाँध कर खड़े हो गए सब विनती में ,

हुक्म हुआ चातक पंछी रट  नहीं लगाएं ,पिऊ -पिऊ को छोड़ कांव -कांव ही गाएँ।

बीस तरह के काम दे दिए गौरैयों को ,खाना पीना मौज़ उड़ाना छुटभैयों को ,

कौओं की ऐसी बन आई पाँचों घी में ,बड़े बड़े मनसूबे आये उनके जी में।

उड़ने तक के नियम बदल कर  ऐसे ढाले ,उड़ने वाले सिर्फ रह गये बैठे ठाले।

आगे क्या हुआ सुनाना बहुत कठिन है ,यह दिन कवि  का नहीं चार कौओं का दिन है ,

उत्सुकता जग जाए तो मेरे घर आ जाना ,लंबा किस्सा थोड़े में किस तरह  सुनाना।

                          -----------------------  (भवानी प्रसाद मिश्र )

कविता -संग्रह ' जी हाँ मैं गीत बेचता हूँ किस्म -किस्म के गीत बेचता हूँ। ' से साभार।

                               ----------------------------------(भवानी प्रसाद मिश्र )
प्रस्तुति :वीरेंद्र शर्मा (वीरु भाई )

भावसार :भवानी भाई की ये कविता आपातकाल में तब लिखी गई थी जब इस देश की तमाम संविधानिक व्यवस्थाओं  के ऊपर एक इंद्रा -जी  पालती मारकर  बैठ गईं थीं।महज़ अपनी कुर्सी बचाने के लिए इलाहाबाद उच्चन्यायालय के फैसले को धता बताते हुए तब उन्होंने जो सन्देश दिया था भारत के जन-मन को उसका खुलासा यह कविता बेलाग होकर करती है। यह वह दौर था जब  तमाम छद्म मेधा उनकी हाँ में हाँ भयातुर होकर मिलाने लगी  थी। लेकिन उस दौर में भी दुष्यंत कुमार और भवानी दा जैसे लोग थे जिन्होंने अपनी अस्मिता को बचाके रखा था और ये कविता दागी थी उस समय की दुर्दशा से संतप्त होकर:

इंदिराजी इंद्रा -व्यवस्था की  मारफत यही सन्देश दे रही थीं कौवों की कांव -कांव ही संगीत होता है। संगीत -फंगीत इसके अलावा और कुछ नहीं होता।
गौरैयाओं को यही कहा था -तुम खाओ पीयो बस इतना बहुत है तुम्हारे लिए इस देश की चिंता तुम मत करना। सुप्रीम कोर्ट भी अब उसे ही दिन कहेगा जिसे हम दिन कहना चाहेंगे और कहते हैं।

ये वो लोग थे जो यह कहते समझते थे -जब हम पैदा हुए थे तभी से इस सृष्टि का निर्माण हुआ है । उस व्यववस्था के ध्वंश अवशेष आज भी अपने बेटे का नाम प्रभात रखके ये समझते हैं हमने सूरज को पाल लिया है। वह भी तभी निकलेगा जब हम चाहेंगे।

इसी इंद्रावी तंत्र के कुछ अवशेष और चंद कट्टर पंथियों की गोद  में पोषण पाते हमारे रक्तरँगी लेफ्टिए आज मोदी को फूंटी आँख नहीं देख पा रहे हैं। जानते हैं किसलिए :

वह इसलिए अब सूरज नियमानुसार उदित हो रहा है किसी का पालतू नहीं है। 

रविवार, 15 अक्तूबर 2017

भौतिक विज्ञानों के झरोखे से : क्या है क्रायो -इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी (दूसरा भाग )

भौतिक विज्ञानों के झरोखे से :

क्या है क्रायो -इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी (दूसरा भाग )

उन्नीस सौ अस्सी के दशक के आरम्भिक बरसों में (Early 1980s)जेक्स डुबोशे ने जैविक अणुओं (ऊतकों आदि )के सैंपलों को द्रुत गति से प्रशीतित करने की एक ऐसी विधि विकसित की जिसके तहत साम्पिल्स  ठीक उसी समय हिमीकृत हो उठते जब उन्हें इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी से देखने की चाह एवं   तैयारी  होती। तात्कालिक प्रशीतली - करण था यह एक किस्म का जो पलक झपकते ही संपन्न हो जाता था। और विधि भी इतनी सरल एक धातु के तार की जाली पे ड्रॉपर जैसी एक युक्ति से साम्पिल को स्प्रेड भर करने की देर -बस साम्पिल जाली पे अनेक घुमावदार (Thin meniscuses)महीन सतह बुन लेते थे।
A meniscus is a rubbery C-shaped disc,a curved surface .

बस यकायक मेनस्क्सिज समेत जाली  को इधर तरल इथेन (-90 C)में दागा उधर वे हिमीकृत भी हो गईं तत्काल प्रभाव के साथ । वही जल जो जैविक ऊतकों का एक आवश्यक अंग रहता है और इलेक्ट्रॉन सूक्ष्दर्शी के लिए अभी तक दुर्जेय शत्रु की तरह  बना रहा था ,अब मित्रवत था। माइक्रोस्कोप फ्रेंडली हो गये जल -महोदय। 
इधर १९७५ के बाद के बरसों में ही इनके सहकर्मी जो-आकिम फ्रेंक ने सूक्ष्मदर्शी से ली गई दो -आयामीय अनेकानेक छवियों(Images ) को त्रिआयामी छवियों में  संयुक्त करने का काम संपन्न कर लिया था। 
१९९० में इनके तीसरे साथी रिचर्ड हेंडरसन ने इसी काम को और परिष्कृत कर एक प्रोटीन(bacteriorhodospin ) की त्रिआयामी इमेज बनाके दिखला दी.कहाँ कौन सा परमाणु इस प्रोटीन में विराजमान है यह भलीभांति देखा जा सका। यही परमाणुविक स्तर का आरम्भिक  विभेदन था।आगे इसी विभेदन का (resolving power of microscope )और परिष्करण किया गया। 

Atomic resolution typically means a distance of 3.3 angstrom (Å) – more than 250-times smaller than the HIV virus (1 Å is one-tenth of a nanometre).

यह एचआईवी -एड्स वायरस से ढाईसौ गुना छोटा आकार है। 

१ एंगस्ट्रोम =एक नैनोमीटर का भी  दसवां भाग (टेन टू दी पावर टेन मीटर्स ),एंगस्ट्रोम सूक्ष्मतर स्तर पर लम्बाई नापने की एक इकाई है। सूक्ष्मतर तरंगों की लम्बाई के मापन के  लिए इसे स्तेमाल किया जाता है। 
२०१५  में अमरीकी जीवन शास्त्रियों की एक टोली ने इस विभेदन को नै परवाज़ देकर और भी परिष्कृत किया। ३. ३ एंगस्ट्रोम से विज्ञानी अब २. ८ एंगस्ट्रोम रिज़ॉल्यूशन पर आ गए थे। बस देखते ही देखते औषध निगमों के लिए Cryo -TEM का महत्व बढ़ गया ,अब हिमीकृत ट्रॅन्समिशन इलेक्ट्रॉन माई - क्रोस्कोप 'संरचना -आधारित -दवाओं 'के निर्माण की ओर  एक कदम और आगे की ओर रख चुके थे  ।  

इस प्रकार जीवन के लिए ज़रूरी कच्चे माल प्रोटीनों के अंदर तांक - झाँक करने का एक रास्ता खुला।जीवन के रसायन को अब थोड़ा और आगे निकलके देखा जा सकेगा ऐसी उम्मीद बँध  चली है।  ( समाप्त )

सन्दर्भ -सामिग्री :https://thewire.in/184432/nobel-chemistry-cryo-electron-microscopy-dubochet-henderson-proteins-biology/ 

शुक्रवार, 13 अक्तूबर 2017

इन दिनों हालात ये हैं इंडिआ के :'सरकार ने जीना हराम कर दिया है' -एक साहब बुदबुदा रहे थे मेरे दफ्तर को लिखकर सरकार को मेरी उठ -बैठ संबंधी आरटीआई मांगने की क्यों जरूरत है ?मैंने सरकार का क्या बिगाड़ा है ?इन्हें लगता है सरकार इनके पीछे पड़ी है ,इन्हें कोई बड़ी सज़ा होने वाली है। कई तो मेरे घर -दफ्तर के लोग भी इस षड्यंत्र में शामिल दीखते है।

इन दिनों  हालात ये हैं  इंडिआ के 

(१ )कहीं से किसी इमारत की कोई ईंट दरक जाए ,वहां से पांच मोदी बेटर्स- निकलते हैं। 

(२ )कहीं आंधी अंधड़ से भी किसी घौंसले से कोई चिड़िया का अंडा गिरके टूट जाए ,कुछ सेकुलर किस्म के प्राणि कहने लगते हैं ,इसके पीछे अमितशाह और मोदी का हाथ है। 
(३ )'सरकार ने जीना हराम कर दिया है' -एक साहब बुदबुदा रहे थे मेरे दफ्तर को लिखकर सरकार को मेरी उठ -बैठ संबंधी आरटीआई मांगने की क्यों जरूरत है ?मैंने सरकार का क्या बिगाड़ा है ?इन्हें लगता है सरकार इनके पीछे पड़ी है ,इन्हें कोई बड़ी सज़ा होने वाली है। कई तो मेरे घर -दफ्तर के लोग भी इस षड्यंत्र में शामिल दीखते है। 

 अपने आप को बड़ा महान आदमी मान ने लगें हैं ये साहब ,अपने महान होने का भरम फीलिंग आफ ग्रान्डियासिटी पाले बैठे हैं ये ज़नाब । इन्हें नहीं मालूम यह 'शिजोफ्रेनिक- बिहेवियर 'और 'बाइपोलर -इलनेस' की उत्तेजन वाली अवस्था का एक ख़ास लक्षण है। लिटमस पेपर टेस्ट है।
(४ )इधर एक शहज़ादा अखिल भारतीय  देवदर्शन यात्रा पर निकल चुका है एक दिन में पांच- पांच  मंदिरों में भगवान् के आगे जाकर इस सरकार का रोना रो रहा है। 
(५ )पूर्व में इनके कई पालतू पाकिस्तान जाकर यही रोना रो आये थे। मोदी हटाओ हमें लाओ। 
https://www.youtube.com/watch?v=2RzdnlVzAgA

गुरुवार, 12 अक्तूबर 2017

लेकिन वाड्रा मारा जाएगा ,उसके ठंडे बस्ते में पड़े मामले में अब तेज़ी आएगी

शुक्रिया शुक्रिया शुक्रिया डॉक्टर सतीश त्यागी जी 

आपने हमें  प्रस्तुत पोस्ट का कच्चा माल पकड़ा दिया।

बिलकुल सही निष्कर्ष निकाला है चेताया है इस मंदमति को -

"ये जीजू को मरवाएगा" 

इसमें एक कमज़ोरी अंग्रेजी भाषा की भी रही है -'जहां ब्रदर -इन -ला 'संज्ञा और सम्बोधन दोनों से ही यह पता नहीं

चलता कि जीजा कौन है और साला कौन है। इसलिए हिंदी भाषा ने -तमाम जीजाओं ने -बड़ी चालाकी से सालिग्राम

(साले साहिब अर्थात )

'आधे- मालिक' हमारे ये भी हैं कहकर तमाम सालों का परिचय करवाना कब का शुरू कर दिया था। ).हिंदी भाषा में कई

जगह ध्वनित अर्थ साले का गाली भी निकाला जाता है। खासकर जब हम किसी को चुनौती देते हुए देख लेने की धमक

देते हैं -कहते हुए साले तुझे तो देख लूंगा।

अब इस वंशीय राजकुमार के यहां तो परम्परा से संबंधों का मतलब जैविक -संबंध ही रहा है। इसीलिए एक मर्तबा इनकी

बहिना के लिए अपने एक सम्बोधन में  नरेंद्र मोदी ने  कहा -वह तो मेरी बेटी समान है ,बेटी ही है तो अगले दिन इनका

रिजॉइंडर चला आया -मेरे पिताजी तो राजीव गांधी थे मैं किसी की बेटी फेटी नहीं हूँ।

यहां ज़नाब सतीश त्यागी जी 

रागात्मक संबंधों के लिए गुंजाइश ही नहीं है। 

राहुल अपनी कुशाग्र -बुद्धि से जानते हैं 'साला' एक गाली है। इसीलिए हो सकता है वह अपने को वाड्रा का साला मानने

में  हीनता  अनुभव करते हों।

बहरसूरत सब जानते हैं कांग्रेस ने अमित शाह को गुजरात में कितना तंग किया था ,कैसे -कैसे आरोप पत्र मढ़े -गढ़े  थे। अमित शाह तो साफ़ बच गए क्योंकि उनके खिलाफ कुछ प्रमाणित न हो सका।

 लेकिन वाड्रा मारा जाएगा ,उसके ठंडे बस्ते में पड़े मामले में अब तेज़ी आएगी। 

अमित शाह के पुत्र के खिलाफ आरोप मढ़ने वाले भी अब बैकफुट पे आये दीख रहे हैं ,बचावी भूमिका में आ गए हैं "रेलवे मंत्री को उनका बचाव नहीं करना चाहिए था "कह रहें हैं।

हमारा मानना है ,जांच से जो सामने आये सो आये ,जांच चले खूब चले ,चिंता किसे है ,ये बात ये मंदमति समझ ले तो उचक -उचक बोलने से कमसे कम इस मामले में तो बाज़ आये। वरना इसका तो जो बिगड़ेगा सो बिगड़ेगा जीजू ज़रूर मारा जाएगा।


आखिर में एक शैर इस मंद मति के नाम (भगवान् इन्हें सुमति प्रदान करे ):

एक ग़ज़ल कुछ ऐसी हो ,

बिलकुल तेरे जैसी हो ,

मेरा चाहे जो भी हो,

 तेरी ऐसी -तैसी हो।   

जब यह आत्मतत्व शरीर से अलग हो जाता है तो प्राण भी अपनी क्रिया बंद कर देता है जिससे मनुष्य मर जाता है। लेकिन इस क्रिया में न जड़ (शरीर )मरता है न चेतन आत्मा। बल्कि दोनों का संबंध विच्छेद हो जाता है। (आत्मा तो अजर -अमर -अविनाशी चेतन तत्व कहा गया है और यह पांच तत्वों का पुतला ऊर्जा का पुंजमात्र विखंडित होकर अपने मूल तत्वों -आकाश -वायु -अग्नि -जल -पृथ्वी में विलीन हो जाता है। ऊर्जा का संरक्षण हो जाता है।

न प्रारेण नापानेन मर्त्यो जीवति कश्चन|  

इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेतावुपाश्रितो | | (कठोपनिषद ,द्वितीय अध्याय दूसरी वल्ली ,पांचवां श्लोक)

भावसार :इस सृष्टि में ब्रह्म ही एकमात्र चेतन शक्ति है ,जो वनस्पति ,जीव -जंतु ,पशु -पक्षी व सभी मनुष्यों के जीवन का आधार और कारण है। इसी शक्ति से ये सभी जीवन पाते हैं ,वृद्धि करते हैं तथा क्रिया करते हैं।

दूसरा तत्व जड़ है जिसकी सभी क्रियाएं इस चेतन तत्व के कारण ही होतीं हैं। (प्रकृति स्वयं जड़ है ,ब्रह्म की ही एक शक्ति -'माया शक्ति' है जिसका ब्रह्म से संयोग होने पर ही यह प्रकृति बनके प्रकटित होती है। ).

मनुष्य के जीवन का आधार भी यही आत्मतत्व है। प्राण एवं अपान  भी इसी के आश्रय में अपनी क्रिया करते हैं। दूसरा तत्व जड़ है जो हमारा पंचभौतिक शरीर है।

जब यह आत्मतत्व शरीर से अलग हो जाता है तो प्राण भी अपनी क्रिया बंद कर देता है जिससे मनुष्य मर जाता है। लेकिन इस क्रिया में न जड़ (शरीर )मरता है न चेतन  आत्मा। बल्कि दोनों का संबंध विच्छेद हो जाता है। (आत्मा तो अजर -अमर -अविनाशी चेतन तत्व कहा गया है और यह पांच तत्वों का पुतला ऊर्जा का पुंजमात्र विखंडित होकर अपने मूल तत्वों -आकाश -वायु -अग्नि -जल -पृथ्वी में विलीन हो जाता है। ऊर्जा का संरक्षण हो जाता है।

आत्मा तो स्वयं: भू संरक्षित तत्व है ही।इसका 'होना 'इज़्नेस शाश्वत  है। जब इसे एक शरीर और उसके साथ एक सूक्ष्म शरीर चतुष्टय -मन -बुद्धि -चित्त-अहंकार मिल जाता है  यह जीव -आत्मा कहलाने लगता है जो आत्मा से अलग नहीं है।

समष्टि के स्तर पर इसे ही ब्रह्म (परमात्मा )कहा गया है। माया में प्रतिबिंबित ब्रह्म ,माया से आच्छादित ब्रह्म को ही ईश्वर कहा गया  है।

जीवन का आधार यही आत्म चेतना है जो सभी प्राणियों के जीवन का आधार है। जड़ में चेतना का संसार इसी आत्मतत्व से होता है। 

https://www.youtube.com/watch?v=6dNAG38cveI 

मंगलवार, 10 अक्तूबर 2017

"राम का नाम भी लोगे तो ऐसे ही जला दिए जाओगे।"तौबा करो अयोध्या से अब वरना ...हश्र जानते ही हो।गो .....धरा .... गोधरा गोधरा गोधरा।

क्या हैं गुजरात हाईकोर्ट के गोधरा फैसले के निहितार्थ ?क्यों सांप सूंघ गया है मीडिया को ?

भाजपा -नीत सरकार के सत्ता में आते ही इंतहापसन्द मुसलमान जो कांग्रेस राज में परितुष्ट रखे जाते थे जिनका हिन्दुस्तान की सम्पत्ति पर पहला हक़ जतलाया दोहराया  जाता था - जिस तरह मुंह खोलकर बोलता रहा है ,वामपंथी कहीं से
एक कन्हैयाँ पकड़ लाये ,उससे पहले रोहित वोमिला के दुखद अंत की वजह बने वह सिलसिला अभी रुका नहीं है।

परिंदे अब भी पर तौले हुए हैं ,

हवा में सनसनी घोले हुए हैं।

वर्तमान कांग्रेस -वामपंथ पोषित  जेहादी सोच के लोगों का हिन्दुस्तान पर बढ़ता शिकंजा और पंजे की शै के  मद्दे नज़र हमें उल्लेखित पंक्तियाँ अनायास याद हो आईं गोधरा के फ़ांसीयाफ्ता मुजरिमों को गुजरात उच्च न्यायालय द्वारा  मिली राहत पर -

सकल जगत में खालसा पंथ गाजे ,जगे धर्म हिन्दू सकल भंड भाजे।

भावसार : सारी  कुरीतियां मिट जाएँ ,खालसा पंथ जागे -सम्भल जाएँ सनातन धर्मी समाज को तिरछी निगाह से देखने  वाले। यही सन्देश था गुरुगोविंद सिंह का खालसा पंथ की नींव रखते वक्त।औरंगजेबी सोच को फतहनामा था ये पंक्तियाँ।
लेकिन कांग्रेस के इरादे आज़ादी के पहले से ही कुछ और चले आये हैं :

१९२५ में कांग्रेस ने खालसा पंथ को एक अलग  धर्म का दर्ज़ा देकर एक तरह से सनातन धर्म के व्यापक स्वरूप में तोड़ फोड़ की ,मानव कृत विखंडन की शुरुआत  थी ये साजिश थी ।इसी साजिश के तहत जैन -पंथ को सनातन धारा से अलग करवाया इसे भी एक अलग धर्म की मान्यता मिली।

ऐसी  लगातार विखंडन की   एक  परिणति गोधरा कांड भी  थी ,जिसके तहत जेहादियों ने यह सन्देश दिया था -जो अयोध्या और राम का नाम लेगा उसका यही हश्र होगा।

आज इस संदर्भ का जेहन में चले आना आकस्मिक नहीं है ,गुजरात हाई -कोर्ट का वह फैसला है जिसके तहत फांसी की सजा को उम्रकैद में तब्दील किया गया है। क्या कुछ संविधानिक तकाज़े रहें हैं इस मामले में ऊंची कचहरी की इस फेरबदल पर हमें कुछ नहीं कहना है।
अलबत्ता जिस तरह से भारतीय प्रिंट और इलेक्त्रोनी मीडिया ने इस खबर को नज़रअंदाज़ किया है वह भारत धर्मी समाज को ज़रूर खबरदार करता है। चौंकाता है ,आगाह करता है ,पूछता है खुद को मुस्लिम फस्टर्स कहने वाले कट्टर पंथियों द्वारा रचित गोधरा के फांसी पाए मुज़रिमों को कोर्ट की राहत पर वह खामोश क्यों है ?यह वही मीडिया है जो उसी दौर में एक मुसलमान एमपी के आगकी लपटों  में घिर जाने का तप्सरा बरसों बरस सुनाता रहा ,कई महीनों क्या सालों यह ज़नाज़ा निकला।

पूछा जा सकता है -

"भारतीय युवा क्या तब जागेगा जब उसके नाम पर भी तलवार चलायी  जाएगी ,पूछा जाएगा उससे -तुम्हारा नाम 'नन्द लाल क्यों है 'अकबरादुद्दीन क्यों नहीं है।कुंजबिहारी क्यों हैं आज़म खाना क्यों नहीं है ? मुरारी लाल क्यों है मोहम्मद अली क्यों नहीं है ?

खुद को मुस्लिम पहले समझने बूझने मान ने वाले जेहादी सोच के लोग यही सोचते होंगें इस फैसले पर  -हमारा कोई क्या कर लेगा ,अधिक से अधिक आजीवन कारावास ,उससे क्या हमारा खूंटा उखड़ता है ?

"राम का नाम भी लोगे तो ऐसे ही जला दिए जाओगे।"तौबा करो अयोध्या से अब वरना ...हश्र जानते ही हो।गो .....धरा .... गोधरा गोधरा गोधरा।    

भारत धर्मी समाज  को काटा जा रहा है ,गोधरा के जेहादियों का यही सन्देश जा रहा है , हम जो कुछ भी करें  ,हम्हारा कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता इस देश में। कहाँ गए नेहरू के वंशज?जिन्होनें इस अलहदगी की नींव  रखी जिन्ना को सरआंखों पर बिठाया ?सब खामोश ही नहीं संतुष्ट हैं मय अपने  पाले हुए प्रवक्ताओं के।

हमारा इस पोस्ट के मार्फ़त सम्पूर्ण भारत -धर्मी- समाज से आवाहन है इस मामले को ,गुजरात उच्च न्यायालय के मौजूदा फैसले के खिलाफ वह उच्चतम न्यायालय  जाए।

जाग जवानी भारत की  ,
कह  अलग कहानी भारत की।

संदर्भ -सामिग्री :यह विचार मानने डॉ नन्द लाल मेहता वागीश जी के हैं जो इस देश के न सिर्फ एक प्रखर विचारक हैं ,भारत धर्मी समाज के एक समर्पित सिपाही भी हैं। उनसे हुई फोन -वार्ता ही हैं ये उदगार जिसमें हमारी भूमिका श्रोता की थी। 

रविवार, 8 अक्तूबर 2017

पानी को आब कहा गया है मुक्तावली (दन्तावली ) का पानी(इनेमल )उतर जाये तो दांत बे -आब। सच्चे मोती का पानी उतर जाये तो दो कौड़ी का। आदमी की आँखों का पानी उतर जाये तो बे -शर्म ,निर्लज्ज कहाये।पानी -पानी हो जाये।

झरोखा सेहत का :एक सामान्य हेल्दी   व्यक्ति को प्रतिदिन

- कितना पानी पीना चाहिए ,और क्यों ?

(१ )क्या आप पर्याप्त पानी पी रहे हैं रोज़ाना ?

(२ )पानी का इंटेक ,आपके द्वारा दिन भर में पीया गया पानी -न सिर्फ आपको चार्ज्ड रखता है ,जलनियोजित  (Hydrated )रखता है,जल नियोजन के लिए जलमिश्रित बने रहने के लिए भी ऐसा ज़रूरी समझा गया है। नाज़ुक चीज़ है आपके शरीर का जल -नियोजन, जल -बजट.हाइड्रेटिड बने रहना। 

आपके द्वारा ग्रहण की गई कैलोरी का यह विनियमन भी करता है नियंत्रित भी करता है कैलोरी इंटेक को ,आपके बॉडी वेट (भार या वजन )को। भूख से प्यास का  कोई संबंध नहीं है ,भूख और चीज़ है प्यास और। 

(३ )राष्ट्रीय चिकित्सा अकादमी (अमरीकी )पुरुषों के लिए प्रतिदिन ३. ७ लीटर तथा महिलाओं के लिए २. ७ लीटर जल रोज़ाना पीने  की सिफारिश करती है। इसमें जलीय पेय भी शामिल हैं अन्य स्रोतों जलीय तरकारियों ,सलाद (ककड़ी ,खीरा ,मूली गाजर आदि -आदि) से चले आने वाला जल भी शामिल है। अल्कोहल इस वर्ग में नहीं आएगा जो बॉडी को डिहाइड्रेट(निर्जला ) करता है -एक बूँद नीट शराब जबान से १००० बूँद पानी खींच लेती है। 

(४ )जल आपके जोड़ों को स्नेहिल बनाये रहता है एक स्नेहक का काम करता है रुक्ष होने से बचाता है। लम्बी दौड़ हो या कोई भी ऑक्सीजन की अधिक खपत और मांग करने वाला व्यायाम या कसरत -जल आपके दमखम को बनाये रहता है। महज मिथ है कि पसीने में पानी नहीं पीना चाहिए। लम्बी दौड़ के धावक छोड़िये रोज़मर्रा की लम्बी सैर के दौरान भी बा -खबर लोग पानी की बोतल साथ रखते हैं। 

(५ ) आपके मिज़ाज़ को खुशनुमा सचेत एवं स्फूर्त ,तथा अल्पावधि याददाश्त को बनाये रखने में भी आप की  मदद करता है - पर्याप्त जल नियोजन।जल का अभाव होने पर आप  की एंग्जायटी (बे -चैनी )बढ़ जाती है। 

(६ ) लिटमस पेपर टेस्ट है आपके जल नियोजन को आंकने का -देखिये आपको प्यास कितनी लगती है आपके पेशाब का रंग कैसा है ?यदि आप  प्यासे नहीं हैं ,प्यास  का एहसास नहीं है और रंग हल्का -पीला तकरीबन -तकरीबन पारदर्शी है तो आपके शरीर का जलमान ,जलनियोजन ,हायड्रेशन लेवल ठीक है। 

(७ )आपके जलनियोजित होने रहने पर आपका दिल धमनियों में पर्याप्त खून सुगमता से भेजता है और ऐसे में आपकी पेशियाँ भी आसानी से पर्याप्त जलीकृत बनी रहतीं हैं ,स्नेहित बनी रहती हैं ।

 डीहाईड्रेटिड  रहने पर आप अपने दिल का काम बढ़ा लेते हैं। दिल को उतना ही रक्त उठाने धमनियों में उलीचने के लिए ज्यादा मेहनत करनी पड़ती हैं। 
(८ )जल -मिश्रित (वेळ -हायड्रेटिड )रहने पर मूत्र मार्ग क्षेत्र के संक्रमण (यूरिनरी ट्रेक्ट इंफेक्शन )के खतरे कमतर रहते हैं। किडनी स्टोन बनने की संभावना डीहयड्रेटिड रहने पर इसलिए बढ़ जाती है ,आपके पेशाब में मौजूद खनिज लवण मणिभ (रवे या Crystals )बनाने लगते हैं। 

(९ )खीरा -मूली -गाजर ककड़ी ,सेलरी ,लेटस , कुरकुरा ताज़ा कच्चा ब्रोक्क्ली  आपके द्वारा ग्रहण जल की मात्रा में ही गिना जाता है। भोजन में इनका अपना महत्व है। तमाम ज़रूरी खनिज यहां से आपको मिलते हैं। 

(१० )जलनियोजित रहने पर आपका पाचन क्षेत्र बा -खूबी काम करता है। प्यासा जलहीना रह जाने,पानी की कमी हो जाने  पर आपका मल(बिष्टा या एक्स्क्रीटा  ) सूख जाता है कब्ज़ रहने लगती है। अक्सर हमारे बुजुर्ग ज़रुरत से बहुत कम जल पीते हैं। 

जलनियोजन से महरूम शरीर बिष्टा (मल )से जलीय अंश वापस खींच लेता है। 

(११ )हाइपो -नाट्रेमिअ या जलविषाक्तण (Hyponatremia or Water-Intoxication ):

हमारी किडनियां (गुर्दे )प्रतिघंटा सौ मिली -लीटर (आम भाषा में सौ ग्राम या एक ग्लास पानी  )  ही हेंडिल कर सकतीं हैं। अब ऐसे में कोई दसलिटर पानी एक साथ गटक ले ,बहुत कम समय में ही सही ,एक के बाद सांस ले लेकर दूसरा फिर तीसरा ग्लास पानी का .....  पी ले तो किडनियां ज़वाब दे जातीं हैं। इस पानी को ठिकाने लगाना उनकी सीमा से बाहर है।  यह मेडिकल कंडीशन है ,फ़ौरन ध्यान न देने पर व्यक्ति की मृत्यु भी हो सकती है। 


बचपन में एक खेल देखा था -सर्कस का एक कलाकार एक बड़ा जार पानी एक बार में ही पी जाता था ,लेकिन फ़ौरन उसे उगल भी देता था। पानी में कई मर्तबा छोटी -छोटी मच्छी भी रहतीं थीं जिन्हें वह लगातार निकाल -निकाल के दिखाता था। कौतुक दिखाने के चक्कर  में आप कभी भी ऐसा न करें। 

वाटरटोक्सीमिया के मामले में पानी की अतिरिक्त मौजूदगी हमारे शरीर में खनिजों का स्तर खतरनाक तरीके से गिरा देती है इसीलिए इस स्थिति को -हाइपो (यानी सामान्य से नीचे का स्तर )नाट्रेमिया कहा गया है। 
अन्य वजहें भी रहतीं हैं इस मेडिकल कंडीशन की :यथा -

देखें उल्लेखित सेतु :

(१ )https://www.google.com/search?q=what+is+hyponatremia+and+what+causes+it&rlz=1CAACAP_enUS646US647&oq=what+is+hyponatremia+&aqs=chrome.5.69i57j0l5.22117j0j1&sourceid=chrome&ie=UTF-8

(२ )Hyponatremia. Hyponatremia is decrease in serum sodium concentration < 136 mEq/L caused by an excess of water relative to solute. Common causes include diuretic use, diarrhea, heart failure, liver disease, renal disease, and the syndrome of inappropriate ADH secretion (SIADH).

(३ )https://www.webmd.com/fitness-exercise/features/water-intoxication#1


How much would you have to drink? An enormous amount. Gallons and gallons of water.
"These are very isolated cases, and this is extremely rare," says Sharon Bergquist, MD. She's an assistant professor of medicine at Emory University School of Medicine in Atlanta. "More people by far and away are dehydrated, [rather] than having a problem with over-hydration."





What Is Water Intoxication?


If you drink a bottle of water here and there when you exercise or when you're hot, you’ll be fine. Where you run into problems is drinking way too much too fast.

कुलमिलाकर लब्बोलुआब यही है :अति सर्वत्र वर्ज्यते ,बोले तो -

अति का भला न बोलना ,अति की भली न चूप (चुप्प ) ,
अति का भला न बरसना ,अति की भली न धूप। 
आपका शरीर एक खेत की तरह हैं इसे सींचिये लेकिन उतना ही जितना ज़रूरी है इसके सुचारु संचालन के लिए। कुछ मेडिकल कंडीशंस में यथा -प्रोस्टेटिक एंलार्जमेंट के मामलों में  एक साथ एक लीटर या और भी ज्यादा पानी  पीना वांछित नहीं है। गुर्दों का काम बढ़ जाता है। 
कुछ खास यौगिक और इतर किर्याओं को करने वाले लोग उष: पान करते हैं एक साथ एक डेढ़ लीटर पानी सुबह -सुबह बासी मुंह पी जाते हैं । यह सबके के लिए न तो सम्भव है न अक्लमंदी का काम है न  मुनासिब ही है । 
(१२ )पर्याप्त जलनियोजन बनाये रखने के और कई फायदे हैं ,सिरदर्द की अवधि और तीव्रता बर्दाश्त के अंदर रहती है। कमतर रहती है। दूसरे छोर पर मीग्रैन (आधा -शीशी का पूरा उग्र  सिरदर्द ) के मामलों  में जलनियोजन का अभाव ,पानी की कमी होने पर मीग्रैन का दौरा  भड़क सकता  है। 
जलनियोजन को बनाये रहने जल की कमी से बचे रहने के लिए अपने साथ हमेशा पानी की बोतल रखिये चाहे फिर वह सैर -सपाटा हो  या किसी भी अन्य किस्म की आउटिंग। रेस्त्रां में वेटर पहले पानी लाता है गटक लीजिये। 
अपनी  खुराक  में फल -सलाद आदि कोशिश कीजिए खुराक का ४० फीसद हिस्सा घेरे रहें। 
यह आकस्मिक नहीं है कहा गया है -जल ही जीवन है। हमारे शरीर का अधिक  भाग पानी ही है। वयस्कों में शरीर का औसतन ५७ -६० फीसद हिस्सा जल ही रहता है।
एक साला होने से पहले शिशुओं में जल की मात्रा ७५-७८ फीसद रहती है जो एक साला होने पर घटके औसतन ६५ फीसद रह जाती है। 
शरीर में मौजूद कुल पानी का दो तिहाई अंश इंट्रा -सेलुलर (कोशिकाओं के बीच में )तथा शेष एक तिहाई इनके बाहर रहता है। पानी हमारी कोशिकाओं का बुनियादी कच्चा माल है जिसका उपयोग कोशिकाओं की वृद्धि में सहायक होता है। 
हमारा कुदरती  तापनियामक- थर्मोस्टेट है जल।
जहां हमारे शरीर में प्रोटीनों और कार्बोहाइड्रेटों के  चय -अपचयन (मेटाबॉलिज़्म )में पानी की जरूरत रहती है वहीँ यह लार के लिए आवश्यक जिंस है जिसकी पाचन में महती भूमिका रहती है। 
हमारे शरीर से मलबा ,अवांछित कचरा ,गैर -ज़रूरी पदार्थ निकालने का एक तंत्र है पानी। गर्भ- जल ही हिफाज़त करता है गर्भस्थ की। जन्मजात  शोक अब्जॉर्बर है शरीर का जल। संभाल के रखता है हमारे दिल औ दिमाग अन्य महत्वपूर्ण अंगों को।  

देखें सेतु :
https://www.thoughtco.com/how-much-of-your-body-is-water-609406

विशेष :पानी को आब कहा गया है मुक्तावली  (दन्तावली ) का पानी(इनेमल )उतर जाये तो दांत बे -आब। सच्चे मोती का पानी उतर  जाये तो दो कौड़ी का। आदमी की आँखों का पानी उतर   जाये तो  बे -शर्म ,निर्लज्ज कहाये।पानी -पानी हो जाये।  

आब गई आदर गया नैनं गया स्नेह।  

मुहावरों लोकोक्तियों से बाहर निकलके देखिये तो पानी की समस्या दिनों दिन जटिल होती जा रही है यहां तक की पानी के बंटवारे को लेकर एक बड़ा युद्ध भी राष्ट्र -राज्यों के बीच छिड़ सकता है। गुज़रे ज़माने की फिल्म 'चम्पाकली' और 'दो बूँद पानी 'पानी की समस्या को बेहतरीन तरीके से उठाती हैं।   

हमारे शरीर में ही नहीं हमारे पर्यावरण में भी पानी का संरक्षण ज़रूरी है। पंचभूतों में से एक आवश्यक तत्व है पानी।इसीलिए कहा गया है 'बिन पानी सब सून ' . 

हमारी नदियों  का जल स्वादिष्ट और पीने योग्य था ,नदियाँ प्रदूषित हुईं जल गंदला ला  गया ,

'जल गया जीवन गया'। नदियों के जल का संरक्षण बे -हद ज़रूरी है।

https://www.youtube.com/watch?v=m8cuLrSIWD8 

जगत की नश्वरता का रूपक भी प्रस्तुत करता है  पानी :

जैसे जल ते बुदबुदा उपजै बिनसै नीत ,

जग रचना तैसे रची कहु नानक सुन मीत। (गुरुग्रंथ साहब नौवां महला श्लोक संख्या २५ )

पानी केरा बुदबुदा अस मानस की जात,

देखत ही बुझ जायेगा ,ज्यों तारा परभात।

इसलिए जीवन का उपहार ही नहीं मृत्यु और संहार भी पानी है :

पानी पानी पानी पानी ,

बन के सुनामी त्रास है पानी ,

मृत्यु और अकाल है पानी ,

जलप्लावन का सार है पानी। 

नेक माया के स्वरूप को भी समझाता है पानी :

कबीर कहते हैं :

पानी में मीन प्यासी रे ,

मोहे सुन -सुन आवत हांसी रे। 

भावसार :परमात्मा का आत्मा से विछोह हैं यहां यद्यपि परमात्मा सब जगह है लेकिन माया शक्ति (अपनी इलूज़री एनर्जी ,भौतिक या मटीरिआल ऊर्जा से आवृत्त परमात्मा से जीव का विछोह बना ही रहता है। माया में प्रतिबिंबित ब्रह्म को ही ईश्वर कहा गया है। यह जगत भी एक प्रतीति मात्र है ,जल में रहते हुए भी मछली अपने जीवन के आधार ब्रह्म को बूझ नहीं पाती।
जलथल सागर हूर रहा है भटकत फिरी  उदासी रे 

ये जीवन समुन्दर की मानिंद ही है जिसकी थाह नहीं पाई जा सकती। हमारा मन उस परमात्मा की खोज में भटकता ही रहता है। 
आत्मज्ञान बिना नर भटके ,कोई मथुरा कोई काशी रे। 

"स्व ''  अपने निज आत्म स्वरूप का ज्ञान न होने की वजह से ही हम बाहर उस सुख की खोज करते फिर रहें हैं उस आनंद को ढूंढ रहें हैं जो हम ही हैं। हमारा रीअल सेल्फ ही सच्चिदानंद है। 

कहत कबीर सुनो भइ साधो ,सहज मिले अविनाशी। 

अपने अंदर उसे ढूंढना सहज है। बस जो मैं नहीं हूँ वह मेरा अज्ञान खत्म हो जाए जो इस शरीर को सच माने हुए है। शरीर तो एक टेन्योर है कालावधि है अभी है अभी नहीं है यही तो माया है :

पानी केरा बुदबुदा अस मानस की जात  

कबीर ने अन्यत्र भी कहा  है :
मोको कहाँ ढूंढें रे बंदे मैं तो तेरे पास में।
भजन और शरणागत होना नाम सिमरन श्री गुरुग्रंथ साहब जी का सार है :

गुण गोविन्द गाइओ  नहीं ,जनम अकारथ कीन ,

कहु नानक हरि भज मना ,जिहि बिध जल कौ मीन। 

यहां भी जल का रूपक है जो मछली का जीवन है ,मछली को पका के खाने के बाद भी वह पानी मांगती  है।मच्छी जो खाते हैं वे जानते हैं इसे खाने के बाद प्यास ज्यादा लगती है। प्रीति  हमारी वाह गुरु से मछली जैसी होनी चाहिये थी लेकिन  हम ने इस जीवन को व्यर्थ कर दिया जीवन के व्यापारों में उसका (वाह गुरु का गुण गायन उसकी प्रशंशा उसके गुणों का बखान ही नहीं किया।  )यूं ही जीवन व्यर्थ गँवा दिया -मानुस जनम अमोल था कौड़ी बदले जाये। 
https://www.youtube.com/watch?v=h33YJ7zQ_dc
    
सन्दर्भ -सामिग्री :(१ )http://www.cnn.com/health