मंगलवार, 3 नवंबर 2015

औरों की तरक्की देखकर ,प्रगति ,उन्नति देखकर यदि आपके मन में ईर्ष्या पैदा हो डाह पैदा हो , विशेषकर अपनों की प्रगति देखकर हमारा मुख म्लान हो जाए ,तो समझ लेना हम बहुत छोटे स्तर के आदमी हैं। अवनति के मार्ग पर हैं।बहुत कठिन है आपकी हाईट देखना और यदि औरों की प्रगति देखकर आप हर्षित हों तो चुपके से अपने आपको कहना हम सही मार्ग पर हैं ,जानना हम साधक हैं। पार लग जाएगी नैया।

औरों की तरक्की देखकर  ,प्रगति ,उन्नति देखकर यदि आपके मन में ईर्ष्या पैदा हो डाह पैदा हो , विशेषकर अपनों की प्रगति देखकर हमारा मुख म्लान हो जाए ,तो समझ लेना हम बहुत छोटे स्तर के आदमी  हैं। अवनति के मार्ग पर हैं।बहुत कठिन है आपकी हाईट देखना  और यदि औरों की प्रगति देखकर  आप हर्षित हों तो चुपके से अपने आपको कहना हम सही मार्ग पर हैं ,जानना हम साधक हैं। पार लग जाएगी नैया।

बारह वर्ष के वनवास के बाद भी एक वर्ष के अज्ञात वास के बाद भी इतनी कठिनाइयों में रहे पांडव ,दूर्वा का रस पीके रहे ,साग -पात ,कंदमूल खा के रहना पड़ा। सूखे मेवे और फल बीनके खाते रहे।   पांडव कितनी भी कठिनाई में रहे , धर्म नहीं त्यागा ,धर्म पर कायम रहे।द्रौपदी आलता लगातीं हैं मेहँदी लगाती हैं दासी बनके रहीं धर्म नहीं त्यागा ,विराट राजा की पत्नी की। धर्मराज युधिष्ठिर को सेवक बनके रहना पड़ा। भीम को पाचक और अर्जुन को वृहनलला बनके रहना पड़ा। नकुल सहदेव को सईस बनके अस्तबल के घोड़ों की सेवा में रहना पड़ा। दिन गिनते रहे ३६५ दिन कब हों और हमें अपना राज्य वापस मिले। हमारा अज्ञातवास संपन्न हो।

कठिन दिनों में जीना  तभी संभव है जब धर्म साथ हो -

कठिन दिनों  में साथ निभाना ,सबके बसकी बात नहीं है ,

सबके संग में रह यह जाना ,सबके बसकी बात नहीं है।

आंधी तूफानों के मेले हों , घर घर दीप जलाना ,सबके बसकी बात नहीं है।

किसी का हाथ तंग हो तो अपना हाथ आगे कर देना। ये बड़ी साधना है। पांडव निकल कर आये थे इन कठिनाइयों से। कृष्ण बीच बीच में मिलने आते रहे। विदुर के सन्देश मिलते रहते। कभी सत्संग कभी पुण्य विचार का सहारा लगाते रहे कृष्ण ।

राजधानी के नाम पर खंडहर दे दिया उन्हें दुर्योधन ने ,जगह मिली तो खाण्डवप्रस्थ  ,जहां सिर्फ दलदल था कंटीली झाड़ियाँ थीं। और वहां उन्होंने इंद्रप्रस्थ बनाया। हस्तिनापुर में उन्हें स्थान नहीं मिला। लेकिन वहां भी उन्होंने एक ऐसी आकृति पैदा कर दीं कि आँगन भी जलाशय सा दिखने लगा। सपाट मैदान झील जलाशय सा दिखने लगा। जलाशय में फल फूल पत्तियां , रंग इस तरह से बिछा दिए कि वह आँगन सा दिखने लगा।

दुर्योधन भर्मित होकर गिर पड़ा। सारी सखियाँ हंस पड़ी। रानियां परिचारिकाएं हंस पड़ीं। हो सकता है ऐसा कह दिया हो अंधे का अंधा है।

शब्द मारक होता है वेधक होता है बोधक होता है। शब्द ब्रह्म का बीज है। आकाश का गुण है। शब्द में अमृत है। गुरु क्या देता है मन्त्र ही तो होता है। शब्द तारक होता है। औषधि होता है। मारक होता है प्राणघातक होता है। शब्द अधरामृत है ,ज्ञानामृत है। एक शब्द का प्राणघातक प्रभाव है और एक शब्द का प्रकाशक। शब्द चरणामृत है ,पंचामृत है ,वचनामृत है। भारत के आदमी को शब्द से अमृत बनाना  आता है।

शब्द सँभारे बोलिए ,शब्द के हाथ न पाँव ,

एक शब्द औषध करे ,एक शब्द करे घाव।

दरिद्रता छीन लेते हैं शब्द। मारक ही नहीं है बोधक भी हैं।

धृतराष्ट्र गांधारी से कहते हैं -मैं कितने छोटे स्तर का आदमी हूँ ,मुझे मालूम था लाक्षागृह में पांडव पुत्र जलकर भस्म हो जाएंगे ,वो लड्डू जिनमें विष था उन्हें खाकर पांडव मर जाएंगे ,मेरी छाती वज्र की है मैं चाहता था किसी बहाने भीम को गले लगाकर चूर चूर करके मार दूँ और यह सब इसलिए कि मुझे पाण्डु पुत्रों को आधा राज्य न देना पड़े ,इतना बड़ा न हो जाए धन हमारे जीवन में कि सम्बन्ध खो जाएं। मेरे संगी साथी मुझसे दूर चले जाएं। बस धन रहे मेरे पास।और आत्मग्लानि से भरे धृतराष्ट्र रात के अँधेरे में महल से निकल पड़े ,गांधारी का हाथ पकड़ दोनों आगे बढ़े। गांधारी भी कैसे देखें उन्होंने तो आँखों पर पट्टी कसी है पति के बराबर  होने के लिए।

खम्भे से दोनों टकराते हैं गिर पड़ते हैं दोनों आवाज़ लगाते हैं कोई सेवक आगे नहीं आता। कौरव सारे मारे जा चुके हैं। अचानक एक आकृति आगे आती है। बहुत जानी पहचानी सी ,हाथ भी जाना पहचाना है स्पर्श भी। कुंती थी यह। दोनों के बीच में आ गई। एक हाथ धृतराष्ट्र के कंधे पे दूसरा गांधारी के कंधे पर रख आगे बढ़ते हुए बोली। जेठानी मुझे अकेली कैसे छोड़ जाओगी। वह झगड़ा तो भाइयों का था। मैं किस्से आदेश लूंगी। मैं तो सदैव आपसे ही आदेश लेती आईं  हूँ। और कुंती ले आई उन्हें व्यासदेव के आश्रम पर। ऐसी है भारत की संस्कृति। भारत की नारी।

सन्दर्भ :देविभागवदपुराण से कुछ अंश 

सच्चाई का ये रकीब , डॉ. बना इरफ़ान हबीब।

किसी की थीसिस किसी का बीज ,

डॉ. बना इरफ़ान हबीब।

ये औरंगज़ेब  दरबारी है ,

तथ्य और तर्क से खाली है।

वरना उसे पीर न कहता ,

जो इतिहास के नाम पर , गाली है।

जिहादी फितरत का मुरीद ,

इसी का नाम इरफ़ान हबीब।

कैसा ये इतिहासकार है ,

मुगलों का ये चाटुकार है।

सच्चाई का ये रकीब ,

डॉ. बना इरफ़ान हबीब।

काश इरफ़ान हबीब ने डॉ.बर्नियर को पढ़ा होता जो औरंगज़ेब के दरबार में बारह बरस रहा ,इस फ्रांसीसी यात्री लेखक ने औरंगज़ेब की धूर्तता और नृशंशता के बारे में अपनी पुस्तक  में जो आँखों देखा हाल लिखा है, काश किसी की थीसिस चुराने से पहले उसे पढ़ लिया होता। मजहबी और जिहादी मानसिकता से कोई सच्चा इतिहासकार नहीं बनता चाहे फिर वो इरफ़ान हबीब हो या सच्चाई का रकीब हो।

संदर्भ -:डॉ.बर्नियर की भारत यात्रा(डॉ बर्नियर की चर्चित किताब ,संवत २०१२ ,पृष्ठ ३२४ ,मूल्य साढ़े चार रूपये ) . प्रथम संस्करण १९५७ में प्रकाशित।

शीर्षक :जिहादी इतिहासकार

बॉलीवुड के गात यही हैं , जिन्ना की सौगात यही हैं।



चाहे शाहरुख खान कहो ,

चाहे खान कहो आमिर ,

नहीं इनका कोई जमीर।

दोनों जिन्ना के पाले हैं ,

नहीं इनके मुख पर तालें हैं ,

ये आज़म खान के स्साले हैं।

बॉलीवुड के गात यही हैं ,

जिन्ना की सौगात यही हैं।

ये दोनों बड़े कुचाली  हैं ,

चाचा इनके अब्दाली हैं।

दारा शिकोह का बिलकुल इनको भान नहीं ,


ये भारत की संतान नहीं।

सोमवार, 2 नवंबर 2015

मार्क्सवादी भकुओं के कच्चे चिठ्ठे

मार्क्सवादी भकुओं के कच्चे चिठ्ठे  : डॉ। नन्द लाल मेहता "वागीश "डी.लिट 

                              (पूर्व फेलो संस्कृति मंत्रालय )
एक ख़ास तरीके से साहित्य अकादमी पुरुस्कारों को वापस करने की होड़ लगी है। ये पुरुस्कार वापस करने वाले लोग कई खेमों के एक संयुक्त झंडे के नीचे आ गए हैं। इनका मुख्य उद्देश्य भारत भाव को बदनाम करना है। मोदी तो बहाना भर हैं ,अपनी  कुंठाओं को छिपाकर ये लोग भारत भाव के विरोध में किसी भी सीमा तक पहले भी जाते रहे हैं। इन तथाकथित साहित्यकारों में  कुछ तो  ढंग के लेखक भी नहीं है। इनकी कई श्रेणियाँ  हैं ,ज्यादातर मार्क्सवाद के बौद्धिक गुलाम हैं। कुछ जिहादी तबीयत के हैं। तो कइयों की मानसिकता जाति और मज़हब की खिचड़ी पकाना है। इनका सूत्र गुलाम वंशी नेहरू कांग्रेस के हाथ में है। साहित्य अकादमी में पहले तो जवाहरलाल नेहरू ने और बाद में इंदिरा गांधी ने इन मार्क्सवादी बौद्धिक गुलामों को प्रतिष्ठित किया था। इनमें से एक अशोक बाजपाई नाम के एक आईएएस अफसर रहे हैं। जिन्होनें भोपाल के भारत भवन को लगभग बाजपाई भवन बना लिया था। इन्होनें सकारी संसाधनों का इस्तेमाल करते हुए स्वयं को साहित्यकार के रूप में प्रतिष्ठित करने का षडयंत्र  किया। ये जनसत्ता में 'कभी कभार' नाम से एक कालम भी लिखा करते थे। जो नितांत अरुचिकर और अपठनीय होता था। इनके बोझिल लेखन से जनसत्ता की पठनीयता भी आहिस्ता -आहिस्ता कम होने लगी थी।इस मार्क्सवादी बौद्धिक गुलाम को कैसे एक कृति पर अकादमी पुरूस्कार मिला वह तथ्य किसी से छिपा नहीं है। डॉ. नामवर सिंह  की दोस्ती इनके काम आई और ये आकदमी पुरुस्कृत लेखक हो गए। ये नहीं भूलना चाहिए कि भारत भवन के करता धर्ता  रहते हुए इन्होनें साहित्यिक दृष्टि से कई धत कर्म किये। हिंदी व्यंग्य के प्रख्यात लेखक शरद जोशी को भोपाल छोड़ने के लिए इन्होनें मजबूर कर दिया। वे स्वाभिमान वश  इनके सामने कभी झुके नहीं। इन्होनें पूरी कोशिश ये ज़ारी रखी कि उनकी रचनाएँ छपने न पाएं ,ये खुन्नस निकालने में निपुण हैं।

संस्कृति मंत्रालय के एक सचिव श्री सीताकांत महापात्र की चरित पत्रिका में विपरीत टिप्पणियाँ दर्ज करके इन्होनें उन्हें त्याग पत्र देने के लिए मजबूर कर दिया। सत्ता की चाटुकारिता करते हुए वे तत्कालीन प्रदेश मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के पक्ष में खड़े रहे। ताकि वे भोपाल गैस काण्ड के अपराधी दोषी एंडरसन को भारत से साफ़ निकल जाने का रास्ता बनाने में सहायक रहे। इससे ज्यादा नैतिक अपराध क्या हो सकता है कि बीसहज़ार से ज्यादा अधिक निरपराध लोगों की मृत्यु का कारण बने मिस्टर एंडरसन सुरक्षित रूप से भारत छोड़कर चले गए। जहां तक इनकी साहित्यिक पात्रता का सम्बन्ध है सुबुद्ध पाठक जानते हैं कि इनकी कवितांए स्वाभाविक कवितायेँ न होकर गद्य को आगे पीछे करके लिखी गई कवितायेँ हैं। जिसे ये वैचारिक कविताएं कहते हैं  वे नितांत रसहीन  कविताएँ हैं। दरसल बौद्धिक गुलामी करने वाला कोई भी शख्स  अच्छा कवि हो भी कैसे सकता है।

मार्क्सवादी भकुओं के कच्चे चिठ्ठे  -(सहभावी )वीरेन्द्र  शर्मा


रविवार, 1 नवंबर 2015

We are suffering because of our projections which relates to the future .All our emotions has a definite chemistry .Pleasure has a different chemistry from pain .Bliss has a different chemistry .Our body on a micro-scale ,the internal apparatus of our body has a very complex chemistry .We do not know the inner mechanism which run this great soup of our anatomy .


    Image result for Masonic Temple Detroit Pictures only
     
    Image result for Masonic Temple Detroit Pictures only
     
    Image result for Masonic Temple Detroit Pictures only
     
    Image result for Masonic Temple Detroit Pictures only

We are suffering because of our memory retained by our tiny brains  which is a small fraction of our vast genetic memory .The genetic apparatus of each cell of our body remembers even the color of the skin of our distant past ancestors .And we are not even aware of this vast reservoir of genetic memory and that little memory retained by the brain of events related to the past and of our past experiences  is eating our present  moments .We are not deleting those unpleasant things .We are refreshing those unpleasant memories each day and want to settle the score .with our opponents .We are suffering because of this memory . 

We are suffering because of our projections which relates to the future .All our emotions has a definite chemistry .Pleasure has a different chemistry from pain .Bliss has a different chemistry .Our body on a micro-scale ,the internal apparatus of our body has a very complex chemistry .We do not know the inner mechanism which run this great soup of our anatomy .

Our present perception is good enough for our survival but not good enough to transcend our limitations ,our physical boundaries .We are only looking outwards without knowing the inner life sciences in us .We have to enhance this perception to know the inner Self .Know this peace of life which is You .

Confidence without clarity is disaster for which there is no management .If I do not know something ,I do not know that .I must admit that .Then only seeking will begin .

Life does not happen in your mind .This thought on which I am focused is not significant than the rest of the universe .For us our thoughts have become more important than our existence .We have taken positions that have become bigger than we ourselves.We have chosen wrong identities of caste color ,nation ,religion and we consider ourselves the best of all other identities.

We are suffering our intelligence related to the outside world .

चार हिस्से हैं ,घटक हैं हमारी मेधा के - बुद्धि ,चित अहंकार और चित्त। हम पहले हिस्से पर ही रुक गए हैं। बाहरी जगत की जानकारी पर ही अटक गए हैं। चित यानी याददाश्त हमारी हमें खा रही है। व्यतीत को ,जो बीत गया ,हम संजोके रखे हैं।डिलीट नहीं करते इस जंक को ,इस्पेम को सम्भाल के बैठे हैं। 

 किसी के द्वारा दस बरस पहले कही गई कोई कटु बात हमें आज भी याद है।हमारे दुःख का कारण बाहर नहीं है ,हम इसे अपने संबंधों के मत्थे  मढ़  रहे हैं।असली याददाश्त का तो हमें  इल्म ही नहीं है। हरेक बॉडी सेल हमारी ,प्रत्येक कोशिका हमारी पूरी वंशावलियाँ का पुराण छिपाए हुए हैं। हमारे पूर्वजों की चमड़ी का रंग भी। स्पर्श से छूकर जानते हैं हम इस जगत को ,संबंधों को। हम पृथ्वी  का ही एक टुकड़ा हैं  जो अन्न हम लेते हैं वह हमारा हिस्सा ही हो जाता है। और फिर यह हिस्सा एक दिन वापस पृथ्वी  ही हो जाता है।किसी से जब हम जैविक तौर पर जुड़ते हैं दैहिक प्रेम करते हैं हम वैसा ही हो जाना चाहते हैं उसे अपना हिस्सा हम बना भी लेते हैं पर बस कुछ पलों के लिए। ये जो कुछ है -पूरी कायनात में ,नीहारिकाओं में हम ही हैं। परस्पर सम्पृक्त। बस हम अपने को जान ले। समझ लें के जीवन का प्रवाह अंदर की ओर है। हम स्वयं अनंत संभावनाएं लिए हैं। आनंद हम ही हैं। बाहर भ्रांतियां  हैं कथित इंटेलिजेंस है। 

कल क्या होगा हम इसे लेकर चिंतित हैं। कल जो हो चुका हम उससे दुखी हैं। हम भीतर नहीं देख पा रहे हैं। क्योंकि हमारी ज्ञानेन्द्रियाँ बहिर्मुखी हैं -आँख ,कान ,नाक ,मुंह ,चमड़ी बाहर की और है। बाहर देख रहीं हैं। इसीलिए हमारा नज़रिया मोतिया ग्रस्त है। 

हम जो कुछ मन के धरातल पर हो रहा है उसे ही जीवन माने बैठे हैं।जीवन तो बाहर घटित हो रहा है। हम अपने विचारों को अर्जित अधूरे अस्पष्ट ज्ञान को अपने अस्तित्व से भी बड़ा मान ने की भूल किये हुए हैं। हमने कुछ मोर्चे संभाल लिए जो इस विचार सरणी की ही उपज हैं। और ये खुद से खुद की बेहूदा बातचीत हमारे जीवन से हमारे प्रत्यक्ष अनुभवों से बड़ी  हो गई है। इसीलिए हम अशांत है ,थिर हैं ,भ्रमित हैं ,स्ट्रेस में हैं। हमारी गति रुक गई है ,विकास रुक गया है। भौतिक सुख सुविधा जुटा लेना विकास नहीं है। 

एक प्रतिक्रिया सदगुरु के प्रवचन पर जो डाउन टाउन डेट्रायट के मैसनरी टेम्पिल में दिया गया :

Virendra Sharma और Amit Saini ने Gunjan Sharma-Saini की पोस्ट साझा की.

Gunjan Sharma-Saini ने 4 नई फ़ोटो जोड़ी — Amit Saini और Sonica Rehan-Beniwal के साथ भाग्‍यशाली महसूस कर रहा है.
In is the only way out! Know thyself & engineer your inner faculties! Delightful session with Sadhguru in Detroit

"यह वैसे ही जैसे हमारे आसपास कई हरामी और कमीने घूम रहे हों -और हम शरमा कर अपभाषा से बचते हुए उन्हें सेकुलर कह दें -चलिए ये तो हुआ भाषा का लोकप्रचलित बहुश्रुत ध्वनित अर्थ।" हम आइन्दा ऐसा शब्द प्रयोग नहीं करेंगे। मुखचिठ्ठे की भाषा को जनमन की भाषा बनाएंगे। अब हम साइबोर्ग जैसे संकर ,हाईब्रीड शब्दों का विहंगावलोकन करते हैं बस सरसरी सी नज़र डालके आगे बढ़ जाएंगे:

भाषा का स्वत : स्फूर्त विस्फोट है फेसबुकिया भाषा 

डिजिटल भाषा ने कुछ दिन पहले एक शब्द गढ़ा था -साइबोर्ग। संक्षिप्त रूप था यह साइबर्नेटिक ऑर्गेनिज़्म का।साइबर्नेटिक्स से 'साई' लिया गया और ऑर्गेनिज़्म से 'ऑर्ग' हो गया साइबोर्ग।   हम और हमारे आसपास आज साइबोर्ग ही साइबोर्ग हैं किसी के दिल को पेसमेकर चलाये है तो कोई इन्सुलिन पेच सजाए है। किसी के घुटने तीन लाख के हैं किसी का जूता जयपुरिया है सवा लाख का।बाहर से लगाए गए अंग नर्वससिस्टम से स्वीकृति प्राप्त कर गए हैं ,प्रतिरक्षा तंत्र को मान्य है और आदमी हो गया साइबोर्ग। आधा आदमी ,आधा मशीन।

दरअसल आज कोई भी कैसा भी धत कर्म करके अपने को सेकुलर कहलवा लेता है चाहे वह जाति और मज़हब का खेल खेलने वाला लबारी लालू हो या हमेशा झूठ बोलने वाला सर्वप्रियकेजर।इन धत कर्म करने वालों ने ,निरंतर झूठ बोलने वाले केजरवालों ने ,भारतधर्मी समाज को इतना खिजा दिया है कि अब वह अपभाषा का प्रयोग करने लगा है सेकुलर को हरामी और कमीना कहने लगा है।यह कोई मान्य स्थिति नहीं है देश को एक सेकुलर टिंडर बॉक्स पे मत खड़ा होने दीजिये।

 ऐसे ही एक सज्जन भारतधर्मी समाज  के लिए कह लिख रहे थे इनके नीचे से छतरी डालके घुमा देना चाहिए। हम इस भाषा का समर्थन नहीं करते हैं। डर है कहीं भाषा अपने अर्थ न खो देवे इन सेकुलर विभूतियों के चलते।जो गुरुग्रंथ साहब को जलाने सनातन धर्म के गाय जैसे प्रतीकों को चिढ़ाकर ऐसे ही अकड़ जाते हैं जैसे बर्फ खाके चमार। (चमड़ा भीग जाने के बाद अकड़ जाता है ,एक दिन शीत ऋतु जब पाला पड़ रहा हो ,  जूते बाहर छोड़ के देख लीजिये ऐसे अकड़ जाएंगे जैसे आज बीफ खाके कई श्रीमान अकड़ रहे हैं। इसे अपने लिए एक उपलब्धि मान रहे हैं और सेकुलर की उपाधि से नवाज़े जा रहे हैं।      

"यह वैसे ही जैसे हमारे आसपास कई हरामी और कमीने घूम रहे हों -और हम शरमा  कर अपभाषा से बचते हुए उन्हें सेकुलर कह दें -चलिए ये तो हुआ भाषा का लोकप्रचलित बहुश्रुत ध्वनित  अर्थ।"

हम आइन्दा ऐसा शब्द प्रयोग नहीं करेंगे। मुखचिठ्ठे की भाषा को जनमन की भाषा बनाएंगे। अब हम साइबोर्ग जैसे संकर ,हाईब्रीड शब्दों का विहंगावलोकन करते हैं बस सरसरी सी नज़र डालके आगे बढ़ जाएंगे:

पहले एक शब्दआया प्रेस्टीट्यूटमीडिया  यानी प्रेस और प्रॉस्टीट्यूशन  का संक्षिप्त रूप मीडिया यानी खबरंडी ,खबरों की मंडी (खबर और मंडी को संयुक्त कर दिया तो हो गया -खबरंडी ).इसका व्यक्तिवाचक अर्थ कृपया न निकालें। अब लो खबरँडुवा शब्द को -भैया जी यह भी व्यक्तिवाचक न समझा जाए। गुणवाचक है यह संकर शब्द भी। जिसकी समाचार देने वाली बीवी शरीर छोड़ गई समाचार एजेंसियां से जो विमुख हो चंद परिवारों का भांड हो गया दल्ला हो गया वह खबरंडुवा हो गया समझो  भाईसाहब। 

जिसकी सोच बीमार हो गई वह Sickular हो गया। सेकुलर का ध्वनित अर्थ बिलकुल दो टूक है। यह मोदी वर्सस रेस्ट आफ इंडिया मैच की तरह है।यानी एक तरफ मोदी दूसरी तरफ सारे सेकुलर।

आज ये सारे सेकुलर वाइरल हो रहें हैं मुखचिठ्ठे पर ,फेसबुक पर। आज जितने साधन हमारे पास हैं इतने कभी नहीं थे ,रातों रात एक चैन्नई का अनाम बच्चा वाइरल हो जाता है पाश्चात्य संगीत का धाकड़ गवैया मान लिया जाता है। फेसबुक प्रतिभाओं को आगे लाये। जो पुरूस्कार लौटा रहे हैं ,पाकिस्तान  सोच को आगे बढ़ा रहे हैं उन्हें बस सेकुलर कहके आगे बढ़ जाएं। इनके  सिर से जूता भी शर्माने लगा है। बचके निकलिए इनसे।

जैश्रीकृष्णा !

ऐसे ही एक सज्जन भारतधर्मी समाज के लिए कह लिख रहे थे इनके नीचे से छतरी डालके घुमा देना चाहिए। हम इस भाषा का समर्थन नहीं करते हैं। डर है कहीं भाषा अपने अर्थ न खो देवे इन सेकुलर विभूतियों के चलते।जो गुरुग्रंथ साहब को जलाने सनातन धर्म के गाय जैसे प्रतीकों को चिढ़ाकर ऐसे ही अकड़ जाते हैं जैसे बर्फ खाके चमार। (चमड़ा भीग जाने के बाद अकड़ जाता है ,एक दिन शीत ऋतु जब पाला पड़ रहा हो , जूते बाहर छोड़ के देख लीजिये ऐसे अकड़ जाएंगे जैसे आज बीफ खाके कई श्रीमान अकड़ रहे हैं। इसे अपने लिए एक उपलब्धि मान रहे हैं और सेकुलर की उपाधि से नवाज़े जा रहे हैं।

भाषा का स्वत : स्फूर्त विस्फोट है फेसबुकिया भाषा 

डिजिटल भाषा ने कुछ दिन पहले एक शब्द गढ़ा था -साइबोर्ग। संक्षिप्त रूप था यह साइबर्नेटिक ऑर्गेनिज़्म का।साइबर्नेटिक्स से 'साई' लिया गया और ऑर्गेनिज़्म से 'ऑर्ग' हो गया साइबोर्ग।   हम और हमारे आसपास आज साइबोर्ग ही साइबोर्ग हैं किसी के दिल को पेसमेकर चलाये है तो कोई इन्सुलिन पेच सजाए है। किसी के घुटने तीन लाख के हैं किसी का जूता जयपुरिया है सवा लाख का।बाहर से लगाए गए अंग नर्वससिस्टम से स्वीकृति प्राप्त कर गए हैं ,प्रतिरक्षा तंत्र को मान्य है और आदमी हो गया साइबोर्ग। आधा आदमी ,आधा मशीन।

दरअसल आज कोई भी कैसा भी धत कर्म करके अपने को सेकुलर कहलवा लेता है चाहे वह जाति और मज़हब का खेल खेलने वाला लबारी लालू हो या हमेशा झूठ बोलने वाला सर्वप्रियकेजर।इन धत कर्म करने वालों ने ,निरंतर झूठ बोलने वाले केजरवालों ने ,भारतधर्मी समाज को इतना खिजा दिया है कि अब वह अपभाषा का प्रयोग करने लगा है सेकुलर को हरामी और कमीना कहने लगा है।यह कोई मान्य स्थिति नहीं है देश को एक सेकुलर टिंडर बॉक्स पे मत खड़ा होने दीजिये।

 ऐसे ही एक सज्जन भारतधर्मी समाज  के लिए कह लिख रहे थे इनके नीचे से छतरी डालके घुमा देना चाहिए। हम इस भाषा का समर्थन नहीं करते हैं। डर है कहीं भाषा अपने अर्थ न खो देवे इन सेकुलर विभूतियों के चलते।जो गुरुग्रंथ साहब को जलाने सनातन धर्म के गाय जैसे प्रतीकों को चिढ़ाकर ऐसे ही अकड़ जाते हैं जैसे बर्फ खाके चमार। (चमड़ा भीग जाने के बाद अकड़ जाता है ,एक दिन शीत ऋतु जब पाला पड़ रहा हो ,  जूते बाहर छोड़ के देख लीजिये ऐसे अकड़ जाएंगे जैसे आज बीफ खाके कई श्रीमान अकड़ रहे हैं। इसे अपने लिए एक उपलब्धि मान रहे हैं और सेकुलर की उपाधि से नवाज़े जा रहे हैं।     

"यह वैसे ही जैसे हमारे आसपास कई हरामी और कमीने घूम रहे हों -और हम शरमा  कर अपभाषा से बचते हुए उन्हें सेकुलर कह दें -चलिए ये तो हुआ भाषा का लोकप्रचलित बहुश्रुत ध्वनित  अर्थ।"

हम आइन्दा ऐसा शब्द प्रयोग नहीं करेंगे। मुखचिठ्ठे की भाषा को जनमन की भाषा बनाएंगे। अब हम साइबोर्ग जैसे संकर ,हाईब्रीड शब्दों का विहंगावलोकन करते हैं बस सरसरी सी नज़र डालके आगे बढ़ जाएंगे:

पहले एक शब्दआया प्रेस्टीट्यूटमीडिया  यानी प्रेस और प्रॉस्टीट्यूशन  का संक्षिप्त रूप मीडिया यानी खबरंडी ,खबरों की मंडी (खबर और मंडी को संयुक्त कर दिया तो हो गया -खबरंडी ).इसका व्यक्तिवाचक अर्थ कृपया न निकालें। अब लो खबरँडुवा शब्द को -भैया जी यह भी व्यक्तिवाचक न समझा जाए। गुणवाचक है यह संकर शब्द भी। जिसकी समाचार देने वाली बीवी शरीर छोड़ गई समाचार एजेंसियां से जो विमुख हो चंद परिवारों का भांड हो गया दल्ला हो गया वह खबरंडुवा हो गया समझो  भाईसाहब।

जिसकी सोच बीमार हो गई वह Sickular हो गया। सेकुलर का ध्वनित अर्थ बिलकुल दो टूक है। यह मोदी वर्सस रेस्ट आफ इंडिया मैच की तरह है।यानी एक तरफ मोदी दूसरी तरफ सारे सेकुलर।

आज ये सारे सेकुलर वाइरल हो रहें हैं मुखचिठ्ठे पर ,फेसबुक पर। आज जितने साधन हमारे पास हैं इतने कभी नहीं थे ,रातों रात एक चैन्नई का अनाम बच्चा वाइरल हो जाता है पाश्चात्य संगीत का धाकड़ गवैया मान लिया जाता है। फेसबुक प्रतिभाओं को आगे लाये। जो पुरूस्कार लौटा रहे हैं ,पाकिस्तान  सोच को आगे बढ़ा रहे हैं उन्हें बस सेकुलर कहके आगे बढ़ जाएं। इनके  सिर से जूता भी शर्माने लगा है। बचके निकलिए इनसे।

जैश्रीकृष्णा !