रविवार, 25 अक्टूबर 2015

तेरी बंदगी से पहले मुझे कौन जानता था , तेरी इश्क ने बना दी मेरी ज़िंदगी फ़साना।

मिट्टी  में मिला दे जुदा हो नहीं सकता ,

इससे ज्यादा तो मैं तेरा हो नहीं सकता। 

किसी ने निकाल के रख दीं हैं चौखट पे आँखें ,

इससे ज्यादा तो रोशन दीया हो नहीं सकता। 

तेरी बंदगी से पहले मुझे कौन जानता था ,

तेरी इश्क ने बना दी मेरी ज़िंदगी फ़साना। 

तुझको खोकर मेरे हाथों की लकीरें भी मिटी जाती हैं ,

अब तो मेरे पास बचा कुछ भी नहीं। 

खुदा मुझे ऐसी खुदाई न दे ,

मुझे अपने सिवाय ,कुछ दिखाई न दे। 

खुदा तो नाम है उस एहसास का , 

 जो सामने रहे और दिखाई न दे।

जब उसका हाथ ,मेरे हाथ के करीब आता है ,

तब ताजमहल बन जाता है। 

शायरी की जींस लिए फिरते हो ,

मिर्ज़ा ग़ालिब ही नहीं मीर  लिए फिरते हो। 

पेंटिंग्स के सब्जेक्ट्स सी तुम , मनभाऊ छवि लिए आई हो।

पेंटिंग्स के सब्जेक्ट्स सी तुम ,

मनभाऊ छवि लिए आई हो। 

फेसबुकियों  को हरषाई हो। 

निरख निरख निज की छवि को ,

पल पल प्रतिपल मुस्काई हो ,

तुम किसकी गाढ़ी कमाई हो ,

मुखचिठ्ठे (फेस बुक )को कब भाया है ,

वो चेहरा जो हरजाई हो। 

फेसबुक को बहुत लुभाई हो ,

कान्हा (कृष्ण कन्हाई )की तुम्ही लुगाई हो। 

शनिवार, 24 अक्टूबर 2015

एक बार झूठ बोलने के बाद व्यक्ति उसका दंश आजीवन झेलता है। सृष्टि करता ब्रह्मा की क्या नियति ,गति और मन रहा होगा यह झूठ बोलने के बाद।आदमी खुद अपनी ही नज़र में गिर जाता है झूठ बोलकर। सच सबसे बड़ा है सच पे रहो। सच्चे रहो। सम्मान से रहो। जो सत्य है वही तो शिव है सुन्दर भी वही है।

सत्संग के फूल :स्वामी नलिनानन्द हिन्दू टेम्पिल कैण्टन (मिशिगन )दो दिवसीय सत्संग (दूसरा दिन )

हम एक दूसरे को 'राम राम जी 'ऐसे ही नहीं कह देते हैं इसका सीधा अर्थ है तुझमें भी राम है मुझमें भी राम है । वासुदेव सर्वं इदं। " मैं आप सबको देख पा रहा हूँ क्योंकि आप सबकी छवि मेरी आँख के नेत्रपटल (परदे ,रेटिना )पर है ,आपका सम्मान मेरी आँखों में है आप सबकी आँखों में मेरा सम्मान है। मेरा बिम्ब बन रहा है "-आप मुझमें वासुदेव देख रहे हैं मैं आप में। कोई काला है कोई गोरा कोई नाटा तो कोई लंबा लेकिन प्राण सबमें एक ही है। वासुदेव सर्वं इति। 

जब आपको यह अपने जीवन में महसूस होने लगे ,जब आपके जीवन में कोई रागद्वेष न रहे तो इसे भक्ति पथ की पहली सीढ़ी समझ लेना -तुझमें राम ,मुझमें राम ,सबमें राम समाया ,सबसे कर ले प्यार जगत में कोई नहीं पराया। 

उद्धरण और कथानकों के माध्यम से स्वामीजी ने अपनी बात को समझाया -

एक बार की बात है द्रोणाचार्य ने  एक एक सफ़ेद कागज और पेंसिल युधिष्ठिर और दुर्योधन को देकर ये कहा जाओ जो भी चीज़ (वस्तु या व्यक्ति )तुम्हें अपने आसपास दुनिया भर में कहीं भी बुरी  दिखें उनके नाम इस कागज पे लिख के लाओ। 

दुर्योधन देखता हुआ कई योजन चला गया ,हर चीज़ उसे बुरी दिखलाई दे। सोचने लगा दुर्योधन ये कागज़ तो बहुत छोटा है किसके किसके नाम लिखूं। सभी चीज़ तो बुरी हैं। कोरा कागज़ लेकर ही गुरु के पास लौट आया। 

युधिष्ठिर आगे बढ़े ही थे कि मार्ग में पड़े एक पत्थर से टकरा गए। सोचने लगे इस पत्थर का नाम लिख लूँ ये बुरा है इसने मुझे गिरा दिया। फिर दिमाग के घोड़े खोले युधिठिर ने गहन विश्लेषण किया -इस निष्कर्ष पर पहुंचे इस पत्थर ने मुझे चैतन्य कर दिया कहीं बड़ा होता पत्थर जिससे मैं टकराया होता तो बेहोश हो जाता। ये पत्थर तो बुरा नहीं है। 

आगे बढ़े तो देखा एक शूकर(सूअर ) विष्टा (गू )खा रहा है।सोचने लगे ये बुरा है इसका नाम लिख लूँ। मंथन के बाद पाया ये तो बेचारा सफाई कर रहा है उस गंदगी की जो हमने ही फैलाई है।  ये बुरा कहाँ है। 
और आगे बढ़े तो रास्ते में मल पड़ा था बुरी तरह गंधा भी रहा था बास मार रहा था ,बहुत ही बुरी गंध आ रही थी उसमें से।उस पर युधिष्ठिर का पैर पड़ा और वह गिर पड़े थे।  सोचा इसका नाम लिख लूँ गहरे पानी पैठे देखा -फल फूल जो भी हम खाते हैं वह तो अच्छे भले होते हैं। गुड़गोबर तो हम कर देते हैं उनका चंद घंटों बाद इसमें इस बेचारे का क्या दोष है। हाँ एक दोष है ये बे -तरहां गंधा रहा है। गहरे उतर कर अपने ही भीतर सोचा तो पाया ये इसलिए गंधा रहा है कहीं आदमी से इसका दोबारा सम्पर्क न हो जाए एक बार के संसर्ग में तो ये हालत कर दी इसने। आखिरकार युधिष्ठिर भी कोरा कागज लिए लौटा। गुरु देव को बोला इसपे मैं अपना नाम लिख लेता हूँ मार्ग में तो मुझे कुछ बुरा दिखाई ही नहीं दिया। 

बुरा जो देखन मैं चला ,बुरा न मिलिया कोय ,

जो मन खोजा आपुनो ,मुझसे बुरा न कोय। 

दोनों के दृष्टि कौण  अलग थे एक नितांत नेगेटिव दूसरा पॉजिटिव। 

स्वामी जी ने एक के बाद एक और एक से बढ़कर एक वृत्तांत सुनाये -एक गुणनिधि नाम का युवक था करता धरता कुछ नहीं था ऊपर से आदतें तमाम बुरी पाले था। चोरी चकोरी गर्दी आवारा करता।  पिता ने दुखी होकर एक दिन उसे घर से निकाल दिया। चलते चलते रात हो गई फिर थोड़ा और आगे जाकर उसके  रास्ते में एक शिवमंदिर पड़ा। मंदिर में अन्धेरा था इसने अपने कपड़ों को आग लगा दी यह सोचते हुए कि मंदिर में जो भी कुछ प्रकाश होने पर दिखाई देगा उसे चुराकर बेच दूंगा और उन पैसों से अपनी क्षुधा शांत कर लूंगा। 

वह भोले भंडारी जो शीघ्र ही खुश हो जाते हैं और इसीलिए आशुतोष (आशु -फ़ौरन ,तोष -तुष्ट ,संतुष्ट ,प्रसन्न हो जाना )कहाते हैं सोचने लगे -यह आधी रात को किसने मुझे प्रकाश का दान दे दिया। शिव ने उसे वरदान दे दिया जा अपने आखिरी जन्म में तू शिव लोक जाएगा पापमुक्त होकर। मृत्यु के बाद मिले -
पहले जन्म में यही बालक एक राजा के यहां पैदा हुआ जिसने इसका नाम रखा दम्भ। दम्भ की एक आदत थी यह जिस भी मंदिर में जाता दीप जलाता अनेकानेक। दीप जलाना इसकी आदत सी हो गई। संस्कार बन गया। अगले जन्म में यही बालक वैश्रवण हुआ। इसका दीप दान करने का संस्कार ,दीप से दीप जलाना जलाते चले जाना इसकी वृत्ति में आ गया  इसका स्वभाव बन चला। अपने आखिरी जन्म में यही बालक कुबेर बना। रावण ने इसी कुबेर का जो रावण का बड़ा भाई था युद्ध में इसे परास्त कर  पुष्पक विमान छीना था। दस हज़ार वर्षों की तपस्या के बाद इसे तीनों लोकों के खजांची का पद मिला था। आशुतोष इसकी तपश्चर्या से प्रसन्न हो इससे मिलने आये पारवती समेत। कुबेर सोचने लगा -इस देवी ने कितने बरस तपस्या की होगी ,मुझसे भी कहां ज्यादा जो इसे शिव का 24x7 का संग साथ मिला। थोड़ी सी ईर्ष्या  भी हुई मन ही मन जिसे माँ पार्वती ने भांप लिया। इसकी तिरछी नज़र पार्वती से छिपी नहीं। उन्होंने शाप दिया जा तेरी वही आँख फूट जाए जिसे तिरछी करके तू मेरी ओर ईर्ष्या  से  भर कर  देख रहा था। शिव ने हस्तक्षेप करते हुए कहा देवी ये बालक तो मन ही मन मलाल कर रहा था सोच रहा था काश मैं भी इतनी साधना कर पाता जितनी उमा ने की है। तुमने इस बेचारे को शाप दे दिया अब इसे कोई वरदान भी तो दो और देवी उमा ने कुबेर को तीनों लोकों का कैशियर बना दिया। एक अलग नगरी अलकापुरी शिवपुरी के ही पास बना दी जहां गन्धर्वों का राजा कुबेर आज भी रहता है।
हमारी वृत्तियाँ बन जाती हैं जो जन्म जन्मांतरों तक हमारे साथ ही यात्रा करती चलती है। 

कर्म प्रधान विश्व रचि  राखा ,
जो जस करहिं तसि  फल चाखा  . 
प्रश्नोत्तरी शैली में स्वामीजी ने एकानन ,पंचानन ,चतुरानन ,दसभुज धारी शब्दों की व्याख्या भी की। आरती के स्वरों को भी समझाया -तुम हो एक अगोचर सबके प्राणपति -तुम सबके प्राण हो ,सबमें प्राण हो ,वासुदेव हो ज्योति पिंड स्वरूप लेकिन इन चरम नेत्रों से दिखलाई नहीं देते हो अ -गोचर बने रहते हो। गो माने हमारी जड़ (चमड़े की बनी )इन्द्रियाँ। 

एक वृतांत और भी बड़ा रोचक सुनाया -एक बार विंध्याचल ने बड़ी कठोर तपस्या की प्रसन्न हो शिव प्रकट हुए बोले वर मांगो। बोला विंध्याचल मेरा कद हिमाचल (हिमालय )से बड़ा (ऊंचा )कर दो। आशुतोष ने कहा तथास्तु। दो दिन बाद ही विंध्याचल के पीछे बसे लोग जहां सूर्यकी किरणें नहीं पहुँच रही थी त्राहि  त्राहि करते शिव के पास पहुंचे। 

शिव ने कहा देखता हूँ तुम जाओ मैं कुछ करता हूँ। शिव नीति का देवता है शिव ने युक्ति लगाईं। विंध्याचल के गुरु अगस्त्य के पास गए। उसे सारा वृतां सुनाया। आदेश दिया तुम दक्षिण की ओर निकल जाओ। रास्ते में विंध्याचल मिलेगा। चरण वंदना के लिए तुम्हारी झुकेगा। तुम उसे उठाना मत। कहना ऐसे ही झुके रहो  जब तक मैं दक्षिण से न लौटूं। तब से विंध्याचल ऐसे ही झुका हुआ है और अगस्त्य उत्तर से प्रस्थान के बाद दक्षिण ही में बस गए थे।

बुद्धि और नीति का देवता है शिव। उससे नीति सीखो। उसका शिवत्व धारण करो जीवन में। एक ही वरदान मांगों शिव से -भगवन में सम्मान के साथ जिऊँ। सत्य आचरण पर बना रहूँ  . 

ब्रह्मा ने एक मर्तबा शिव के परीक्षा लेने पर झूठ बोला था पता लगाना था ये ज्योतिर्लिंगम् (शिव ज्योति ),सृष्टि में कहाँ जाकर समाप्त हो जाती है।विष्णु को भी इसी काम के लिए भेजा गया था। विष्णु ने सीधी सच्ची बात कह दी। भगवन मुझे इसका ओर छोर नहीं मिला। ब्रह्माजी दो झूठे गवाह भी अपने साथ ले आये। एक केतकी (एक पुष्प )और दूसरी गाय। देवों के देव महादेव ने ब्रह्मा जी को यह शाप दिया दुनियाभर में तुम्हारे मंदिर कहीं नहीं होंगे। पुष्कर जी (राजस्थान )को छोड़कर ब्रह्मा जी का मंदिर कहीं नहीं है। गाय को शाप दिया जब भी तुम कुछ खाओगी तुम्हारी ही लार उसे दूषित कर देगी , लार टपकेगी। गाय को हाथ में कुछ लेकर खिला कर देख लो आपका हाथ लार से सन जाएगा। केतकी को शाप दिया तुम्हें देवता को नहीं अर्पित किया जाएगा। 
एक बार झूठ बोलने के बाद व्यक्ति  उसका दंश आजीवन झेलता है। सृष्टि करता ब्रह्मा की क्या नियति ,गति और  मन रहा होगा यह झूठ बोलने के बाद।आदमी खुद अपनी ही नज़र में गिर जाता है झूठ बोलकर।  
सच सबसे बड़ा है सच पे रहो। सच्चे रहो। सम्मान से रहो। जो सत्य है वही तो शिव है सुन्दर भी वही है। 


हरि व्यापक हरि कथा अनंता और यह भी तो -

हरि व्यापक सर्वत्र समाना ,

प्रेम ते प्रकट हीइहिही मैं जाना।  

स्वामी जी ने प्रणव ओंकार (ओम )के बारे में बतलाया सभी मन्त्रों को चैतन्य यही ओम प्रदान करता है।    



About 1,510 results

राम ने विश्वामित्र के कहने पर अपना पाँव धीरे से उठाया उसमें से रज कण टपके चट्टान पर पड़े और अहिल्या प्रकट हो गईं और अश्रुपूरित नेत्र लिए भगवान के पैर पकड़ लिए कहते हुए -मैंने आज तक किसी पर -पुरुष का स्पर्श नहीं किया लेकिन आज मैं आपके पाँव नहीं छोडूंगी। राम ने अहिल्या को अपना धाम दे दिया -कहा मन तो लौकिक पदार्थों का आकांक्षी है मैंने तुझे अपना धाम दे दिया ।तू विष्णु रूप हो वैकुण्ठ में रह।

अहिल्या होने का मतलब 

एक ऐसा आश्रम राम को दिखाई दिया जहां कोई सिसक रहा है। कौन है जो सिसकियाँ ले रहा है कौन है जो बार बार रुदन कर रहा है। कौन है जो मुझे याद आ रहा है मुझे बुला रहा है। क्या पिता दशरथ मुझे याद कर रहें या माता कौशल्या। नहीं ऐसा हो नहीं सकता है। कौन है जो सिसकियाँ ले रहा है। वन में गुरुविश्वामित्र बहुत आगे निकल गए थे राम ठिठक कर खड़े हो गए। सिला के नज़दीक पहुंचे ,वह सिला ही सिसक रही है। आसपास सरोवर सूखा है पेड़ तो हैं आसपास ,पर पल्लव नहीं हैं ,लता वल्लरियाँ नहीं हैं। पशु पक्षी नहीं हैं ,बस सब कुछ सुनसान उजाड़ ,बस रोती  हुई सी एक सिला।वन तो जीवित होता है। ये कैसा वन है। राम ठिठक गए अचानक ठहर गए। चलते समय पिता ने कहा था देख राम मैं तुझे भेज तो रहा हूँ पर गुरु की छाया से कभी दूर न हो जाना। गुरु हर पल सिखाते हैं। वे जब बोलते नहीं हैं तब भी अपने  आचरण से  सिखाते हैं ,सिर्फ बोलकर ही नहीं सिखाते ,अपनी चेष्टाओं से अपने बहुत अद्भुत विचारों से भी सिखाते हैं ।उनके आसपास कब क्या विचार पैदा हो जाए वह क्या सिखा दें, इसलिए उनकी छाया से भी कभी अलग मत होना। वह गुरूजी की छाया को कभी नहीं छोड़ते  थे। लेकिन आज गुरु देव आगे निकल गए थे।   

राम ने गुरुदेव  के पास आकर पूछा ये सिला कौन है ,ये कौन पत्थर है जो मुझसे चीख चीख के कुछ कह रहा है। उस आश्रम के आँगन में एक बड़ा सा पत्थर एक बड़ी सी चट्टान एक सिला पड़ी थी वह सिला जैसे रो रही है। उस सिला में ही जैसे कुछ  गीलापन है। 
आश्रम दीख एक मग  माहिं  ,जीव जंतु खग मृग कछु नाहिं -
आश्रम देख एक रस्ते में -यहां पूरे आश्रम में घास तो है पर जली हुई सी। राम बहुत पीछे रह गए थे लौटकर आये गुरुदेव। राम ने चट्टान के पास आकर पूछा ये सिला कौन है ये कौन पत्थर है। गुरुदेव को अचानक ध्यान आया ये तो अहिल्या है। ये गौतम नारी है। पूरा इतिहास सुनाने लगे क़ि गौतम के आश्रम में कैसे यज्ञ आदि होते थे और जब गौतम आहुति देते थे तो देवता खुद लेने आते थे कहते थे हमारे हाथ पे ही हमारा हिस्सा रख दो इतना बल था उनके तप में।

जिसके पास ये तीन चीज़ें हैं :चिंतन की शुद्धता ,चरित्र की उच्चता  और व्यवहार की पारदर्शिता। उसके पास सारा सौंदर्य आ जाता है। ये तीन चीज़ें बहुत बड़ी हैं। अनिंद्य सुंदरी थीं अहिल्या। इंद्र देखकर चकित हो गए। ठगे से रह गए इंद्र और वह उसी रात चन्द्र की मदद से उस  आश्रम में पहुंचे जहां अहिल्या अपने पति के साथ भूमिशयन कर रहीं थीं। चन्द्र ने आधी रात को मुर्गा बनकर बांग दी इंद्र के आदेश पर। अचानक गौतम उठे -आधी रात कब हो गई ?भोर हो गई मेरा संयम कहाँ गया क्या मैंने गलत भोजन कर लिया?। ध्यान रहे -हम वही होते हैं जो हमारी थाली में होता है। अब ये  मुर्गा मुझे जगायेगा।मेरा तप बल संयम सब कहाँ गया ?बस गौतम ऋषि अचानक उठे और कमण्डलु लेकर गंगा की तरफ दौड़े। लेकिन गंगा बड़ी उपेक्षणीय लगी गंगा जैसे कह रही हो यहां से भाग। गंगा का जल उन्हें उदास लगा गौतम ने आकाश की तरफ देखा। आकाश में तारे निकल रहें हैं।ये तो आधी रात है।  चन्द्रमा कहाँ हैं आज तो पूर्णिमा है। बस गौतम ऋषि समझ गए मेरी कुटिया में कोई छल हो रहा है। दौड़े कुटीर की ओर। 
इंद्र इसी ताक में था। 
अहिल्या ने एक साथ दो गौतम देखे एक वह जो उनके आँचल को उघाड़ रहा है उनके अंगों का स्पर्श कर रहा है। एक वह जो द्वार से अभी अभी अंदर घुसा है। अहिल्या मुस्कुराईं। प्रणाम करके कहना चाहतीं है मेरा कोई दोष नहीं हैं।उधर गौतमवेशधारी  इंद्र उनका आँचल अभी उघाड़ ही रहा था। अहिल्या चौंकी ये द्वार पर कौन हैं मेरा पति तो गंगा नहाने गया  थे। लौटकर इतना शीघ्र आने वाला फिर यह कौन है।  

लेकिन उनकी मुस्कुराहट देख कर गौतम ऋषि क्रोध में आ गए।अहिल्या कहतीं ही  रह गईं। आप क्रोध में हैं इससे आपका तप क्षीण हो जाएगा। आप ऐसा न करें मेरा कोई कुसूर नहीं है। आप बहुत अपछ्तायेंगे बाद में।  जब किसी को क्रोध आये तो उसे उत्तेजित मत करो। क्रोध विजातीय वस्तु है क्रोध बाहर से आता है। आपका स्वभाव नहीं है क्रोध। विवेक छीन  लेता है आपसे आपका क्रोध। आप बिखर जाते हैं छिन्नभिन्न ,विच्छिन्न हो जाते हैं।बहुत देर हो चुकी होती है जब क्रोध उत्तर जाता  है और आप को अपना आपा याद आता है ।  

जब कोई आपसे नहीं बोलता तब आप चट्टान जैसे हो जाते हो। जब आप बिलकुल अकेले पड़  जाते हैं तब पत्थर जैसे हो जाते हैं जब अपनी सी कहने वाला कोई न हो आपके पास कोई  संवेदना व्यक्त करने वाला न हो तब आप सिला ही तो हो जाते हैं ।पर गौतम तो क्रोध में आकर शाप दे चुके थे। "जा तू शीला बन जा। सिसक सर्दी में तप झुलस भीषण गर्मी में भीग वर्षा में निर्जन वन में। जहां न कोई खग हो न मृग। 
गौतमी बोली अब मेरे उद्धार का उपाय तो बता दो ऋषिवर । मैं कैसे इस शाप से मुक्त  होवूँगी। इतना तो उपकार कर दो मुझ पर।

जब कोई हमारे बहुत निकट का व्यक्ति हो तो समझ जाए क्रोध भी ज्यादा ही करेगा। तब आप सारा स्ट्रेस निकाकर शांत  हो जाइए।आप उसे प्रोवोक (भड़काइये मत )मत कीजिये  

गौतम ने कहा  ये ठीक है तू निर्दोष है पर तुझे पर -पुरुष का स्पर्श पता क्यों नहीं चला जबकि उसमें न कोई शील होता है न संकोच।अहिल्या बार बार प्रणाम कर रहीं है दोहरा रहीं हैं मेरा कोई कसूर नहीं हैं लेकिन तब तक गौतम ऋषि जल छिड़क चुके थे। शाप दे दिया। इंद्र को भी कहा अब तू स्वर्ग का राजा नहीं रहेगा।इसी पल से तेरा इन्द्रत्व चला गया।  भागा चन्द्र , भागकर शिव के आश्रम में पहुंचा-बोला प्रभु मेरी रक्षा करो गौतम ऋषि मुझे छोड़ेंगे नहीं । ऋषि ने उसे छोड़ ज़रूर दिया लेकिन आज भी चाँद में दाग दिखाई देता है वह दे -दाग नहीं है.  

वरदान दिया ऋषि गौतम ने -इसी रास्ते से यहां राम आएंगे तुझे छूएँगे मेरे तप का सारा लाभ तुझे मिलेगा और तेरा उद्धार हो जाएगा। जब सारी दुनिया आपसे अलग हो जाए तब भी राम आपसे अलग नहीं हो सकता। ईश्वर जीव से कभी अलग हो ही नहीं सकता हम ही अलग हो जाते हैं।अपना स्वभाव भूलकर जीते रहते हैं। 

राम ने विश्वामित्र के कहने पर अपना पाँव धीरे से उठाया उसमें से रज कण टपके चट्टान पर पड़े और अहिल्या प्रकट हो गईं और अश्रुपूरित नेत्र लिए भगवान के पैर पकड़ लिए कहते हुए -मैंने आज तक किसी पर -पुरुष का स्पर्श नहीं किया लेकिन आज मैं आपके पाँव नहीं छोडूंगी। 
राम ने अहिल्या को अपना धाम दे दिया -कहा मन तो लौकिक पदार्थों का आकांक्षी  है मैंने तुझे अपना धाम दे दिया ।तू विष्णु रूप हो वैकुण्ठ में रह। 

वैकुण्ठ जानते हैं किसे कहते हैं -जहां कोई कुंठा न हो। 

 उसने कहा मैं मनवांछा फल चाहतीं हूँ आपका दिया हुआ वरदान मुझे नहीं चाहिए। मैंने सुना है भगवान मनवांछा फल देता हैं ,मनोकामना पूर्ण करते हैं। 

मैं स्त्री हूँ मेरे पति अशांत होंगे। मुझे देखकर ही शांत होंगें -बस वे मुझ पर प्रसन्न हो जाएं मैं इतना ही चाहतीं हूँ।  मुझे उसी लोक में भेज दीजिये जहां मेरे पति हैं। 

धन्य है भारत की नारी। भगवान बोले उसने तो तेरा अपमान किया तुझे शाप दिया तू उसी के पास जाना चाहती है। उस पति के लिए ही वर मांग रही है जिसने तुझे कष्ट दिया प्रताड़ित किया ,अपमान किया तेरा। शाप दिया तुझे । 

शुक्ल प्रतिपदा का द्वितीया का ,तृतीया (तीज ),चौथ ,नागपंचमी का व्रत  करती है दूज का व्रत करती है यम दुतिया का व्रत करती है ,चौदस- रूप चौदस का व्रत  करती है यही नारी ।षष्टि का व्रत रखके ये गंगा में खड़ी हो जाती है।अष्टमी का व्रत करती है ,रामनौवमी का व्रत करती है ,दशहरा का व्रत करती है।   
अमावस से पूर्णिमा तक सारे व्रत करती है भारत की नारी। लेकिन जब ये अपने पर आती है तो कमण्डलु का जल छिड़क कर ब्रह्मा विष्णु महेश को भी  बच्चा बना देती है ये अनसुइया बनकर । सावित्री बनकर अपने वाक्चातुर्य से यम से अपने पति के प्राण छुड़ा लेती है। जो काल का कोर बन गया है उसे वापस ले आती है। ये काली और तारा  बनके महिषासुर का वध करती है।पार्वती बनकर ये क्या नहीं करती।  

जयश्रीकृष्णा !


श्री राम चरण के सुखद स्पर्श से... (Ramayana)

  • 7 years ago
  • 44,634 views
Original edit (as telecast in DD days) from the epic Indian television series: Ramayana (the DVD contains a variation edit.)...


शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2015

गुरु गृह गए पढ़न रघुराई , अल्पकाल विद्या सब पाई।

सत्संग के फूल 

भगवान (विष्णु रूप में श्रीकृष्ण )की दो पत्नियां हैं -एक भूदेवी (भूमि जिन्हें जगत माता कहा गया है )दूसरी श्रीदेवी (लक्ष्मी जी जो हम सबकी दूसरी माता हैं,विष्णु पत्नी होने के नाते ). 

भगवान कहते ही उसे हैं जो भूमि -गगन -वायु -अग्नि -नीर (भ +ग +व+आ +न )(I की मात्रा ,आ का डंडा से अग्नि ,न से नीर ,ग से गगन ,भ से भूमि  ) को नियंत्रित करता है।  


दशरथ उसे कहा गया है जो दसों इन्द्रियों का स्वामी बन गया है जिसने इन्द्रिय (ऐंद्रीय )विजय प्राप्त कर ली है दसों इन्द्रियों को जीत लिया है उनका रथी (सारथी )बन गया है।हमारी देह को भी दशरथ कहा गया है।नवद्वारपुर भी कहा गया है क्योंकि इसके नौ द्वार हैं -दो नासिका छिद्र (नथुने ) ,दो कान ,दो आँख ,एक मुंह ,और मल और मूत्र द्वार।  

रावण उसे कहा गया है जो संताप दे अपने दसों मुखों से चुभन दे ,कैक्टस हों जिसकी अहंकार से सनी वाणी में। 

दशरथ पुत्र जन्म, सुन काना ,

मानों ,ब्रह्मानंद समाना।  

दशरथ ने जब राम जन्म की बात सुनी तो वह आनंद से भर गए। आनंद हमारा निज स्वरूप है।सुख तो अस्थाई है मन की वस्तु है। इन्द्रियों का भोगविषय है। आनंद स्थाई है।  

जो कानों से पी जाती है उसे कथा कहते हैं। कथा सुनने से दृष्टि बदल जाती है। पुत्र जन्म का समाचार सुनकर दशरथ की दृष्टि बदल गई। भागे भागे गुरु वशिष्ठ जी के पास गए -बोले मुझे आनंद हो गया। भाव यह है भक्ति ,ज्ञान से आदमी का दृष्टिकोण बदल जाता है।परमात्मा को देखके दशरथ खुद आनंद हो गए।  

वशिष्ठ जी के पास पुन : गए बोले इन बालकों के नाम रखिये -

साधुता सार्थक हुई गुरुदेव की -उन्हें सच्चिदानंद मिल गए। आज जीवन धन्य हो गया इसी बात के लिए तो जी रहे थे। आज नारायण मिल गए। उन्होंने बालक को हाथों में उठाया और पहले चुपके से उसके चरण छू लिए -ये ही तो वह चरण हैं जहां से गंगा निकलीं हैं। थोड़ा ऊपर जाकर नाभि का स्पर्श किया -यही तो वह स्थान है जहां से भगवान के नाभि कमल से ही ब्रह्मा की उत्पत्ति होती है। जब भगवान की आँखों में देखा तो गुरु वशिष्ठ  की समाधि लग गई। 

जो जीव को मुक्ति देता है आनंद देता है जिनके अनेक नाम हैं पहले उनका नाम रखा -राम।जो जीव को  आनंद देता है पूर्णता देता है जो भारत की भोर का पहला स्वर है-वह राम है । भारत के लोग तो जब किसी बेकार के आदमी की बात सुनाने लगो तो  कहते हैं छोड़ो - छोड़ो राम राम राम क्या राग छेड़ दिया बंद करो यानी निंदा किसी की करते हैं तो भी राम राम कहते हैं ,आश्चर्य में भी भारत का आदमी राम राम कहता है शमशान में भी राम का नाम साथ जाता है -हरि  का नाम सत्य है राम नाम सत्य है।सत्य में ही गति है।  प्रसव की पीड़ा में माँ राम कहती है।दुःख में सब राम को ही याद करते हैं। राम के बाद क्रम में भरत का जन्म हुआ है। गुरु एवं सभी उनके नाम के बारे में कहते हैं - ये बालक बिलकुल रूप रंग में राम जैसा श्याम वर्णी है ।  

विश्व भरण पोषण कर जोई 
ताकर  नाम भरत अस होई । 

पहले गुरुदेव ने सबसे छोटे बालक चौथे शिशु का नाम रखा। तीसरे बालक का सबसे बाद में बतलाया। 

जाके सिमरन से रिपु नाशा,

नाम शत्रुघ्न वेदप्रकाशा। 

जो अंत : बाह्य शत्रुओं से अयोध्या को बचाएगा ,वेद आदि की रक्षा करेगा वह शत्रुघन है।जो सब प्रकार से रक्षा करेगा अयोध्या की। 

सबसे अंत में गुरु ने तीसरे बालक का नाम बतलाया -लक्षमण वैराग्य है। संत ,सतगुरुओं  का धन वैराग्य है स्त्री का धन उसकी शीलता है लज्जा है मर्यादा है शील संकोच मर्यादा  ही है उसका धन।  वैसे ही सन्यासी का धन वैराग्य है। जिसके पास वैराग्य नहीं है उसकी साधुता शिथिल हो जाती है।  

ब्राह्मण का धन जैसे ज्ञान है सदगुरु  के पास धन है वैराग्य। गुरु के पास धन था वैराग्य का इसीलिए उन्होंने लक्षमण का नाम अंत में रखा -पति -पत्नी के बीच में भी जो रहता है 24 x7 जो लक्ष्मी जी को भी प्रिय है नारायण को भी। जिसके बिना दोनों सो नहीं सकते -जो शेष शैया है नारायण की वह लक्षमण है।लक्षमण वैराग्य का प्रतीक हैं। एक पल वो लक्ष्मण के बिना  नहीं रहते ,जो उनकी प्रिवेसी में दखल नहीं देता और लक्षमण भी जिनके बिना एक पल भी न रह सके वह लक्षण धाम लक्ष्मण हैं। वह लक्षमण है शेष नाग। 

लक्षण धाम राम प्रिय,
सकल जगत आधार ,
गुरु वशिष्ठ कही राखा
 लक्षमण नाम उदार। 
उसीके माथे पे तो ये सारी धरती टिकी है।ये सारा ब्रह्माण्ड उसी के मस्तक पर तो टिका है।  वही तो सारे जगत का आधार हैं। 

गुरु गृह गए पढ़न  रघुराई ,

अल्पकाल विद्या सब पाई। 

विद्या उसे कहते हैं जो हमारे भेद को मिटा दे। पूर्णता प्राप्त कर दे। हमारे होने के अर्थ को प्रकट कर दे। हमारे अंदर के भय और भ्रम का निवारण कर दे।अभाव का भंजन कर दे भीतर की पवित्रता को प्रगट कर दे। हमारे उद्देश्य को जो स्पष्ट कर  दे। विद्या के बाद व्यक्ति में पूर्णता आती है। विद्या प्रकाश पैदा करती है। प्रकाश जीवन का नाम है विद्या संबंधों के ,सम्बन्धियों के सच को उजागर करती है। वो भोग क्या हैं जिन्हें हम भोग रहे हैं। भोग हमें  तो नहीं भोग रहे।  

बंधू सखा ये वक्त बहुत संगीन है इस वक्त का तकाज़ा दाल नहीं हैं देश है। ये देश एक बार फिर से टूट जाएगा। हर अनिवासी भारतीय शान से कहता है मोदी ने हमें बचा लिया -हमारा मान सम्मान सोनिया ने मनमोहन को पूडल बनाके बहुत गिरा दिया था। अब हम सिर उठाके चलते हैं पाट देंगें भारत को विदेशी निवेश से। पहली मर्तबा निवेश फ्रेंडली माहौल बना है हिन्द में। दुनिया भर की पहली दस इकोनॉमी यहां निवेश की पहल करने की होड़ में है। आज हर मुल्क का प्रधान मोदी के भारत में निवेश की पहल को आतुर है।कंधा मिलारहा है साथ चलने को हर मुद्दे पे। तत्पर है आतंकियों के खिलाफ एक साझा मुहिम रचने को। पहली बार अपने भारतधर्मी समाज होने पर गौरवान्वित महसूस करते हैं हम लोग। लगता है मुल्क दोबारा आज़ाद हुआ है घियासुद्दीन गाज़ी उर्फ़ गंगाधर नेहरू के वंशजो से। ये आज़ादी मुकम्मिल रहे बनी रहे यूं ही इसके लिए चाय वाले के साथ आना होगा। मैं हर बरस जून से नवंबर तक यही अमरीका में होता हूँ मोदी के स्वागत में लोगों को दीवाना होते मैं ने देखा है। तू कहता है कागद लेखी मैं कहता हूँ आँखिन देखी।

एक प्रतिक्रिया निम्न पोस्ट पर :

आँख रतौँधी जिनकी है ,

उनको क्या दिखलायेंगे ,

अच्छे दिन जब आएंगे। 

वो जो इस्केम ही खाएंगे ,

प्याज भला क्या खाएंगे। 

जिनके पेट में टू जी है ,

आँतों में है कॉमन गेम्स ,

श्याम सखा भी क्या उनकी ,

बंशी नित्य बजायेंगे।

लालू को दे वोट सखा ,

महाठगिया कहलायेंगे। 

जब कटे फटे सर सीमा पार से आएंगे ,
वो अच्छे दिन कहलायेंगे।
जब टूजी फूजी क़ाज़ी लौटके आएंगे ,
वे अच्छे दिन कहलाएंगे ,
मंत्रीप्रधान जब पूडल ही कहलायेगा ,
तब अच्छे दिन फिर आएंगे।

महादेव हर हर ,मोदी घर घर
इटली वाली अम्मा ,को दिखलायेंगे। 

एक प्रतिक्रिया निम्न पोस्ट पर :






Shyam Skha Shyam ने अपनी चित्र साझा किया.

Shyam Skha Shyam की फ़ोटो.
Shyam Skha Shyam से ग़ज़लों की दुनिया
दोस्तों एक समसामयिक पोस्ट आपकी महफ़िल

Udan Tashtari और 184 अन्य लोगों को यह पसंद है.
टिप्पणियाँ
Shakuntla Sharma अभी नहीं ! अभी नहीं !अभी नहीं !
Shakuntla Sharma श्याम जी उलटी गिनती की जल्दी न करो !
Virendra Sharma आँख रतौँधी जिनकी है ,

उनको क्या दिखलायेंगे ,

अच्छे दिन जब आएंगे। 

वो जो इस्केम ही खाएंगे ,

प्याज भला क्या खाएंगे। 

जिनके पेट में टू जी है ,

आँतों में है कॉमन गेम्स ,

श्याम सखा भी क्या ,

उनकी बंशी नित्य बजायेंगे।




Shyam Skha Shyam ने अपनी चित्र साझा किया.

Shyam Skha Shyam की फ़ोटो.
Shyam Skha Shyam से ग़ज़लों की दुनिया
दोस्तों एक समसामयिक पोस्ट आपकी महफ़िल
Udan Tashtari और 184 अन्य लोगों को यह पसंद है.
टिप्पणियाँ
Shakuntla Sharma अभी नहीं ! अभी नहीं !अभी नहीं !
Shakuntla Sharma श्याम जी उलटी गिनती की जल्दी न करो !
Virendra Sharma आँख रतौँधी जिनकी है ,

उनको क्या दिखलायेंगे ,

अच्छे दिन जब आएंगे। 

वो जो इस्केम ही खाएंगे ,

प्याज भला क्या खाएंगे। 

जिनके पेट में टू जी है ,

आँतों में है कॉमन गेम्स ,

श्याम सखा भी क्या ,

उनकी बंशी नित्य बजायेंगे।