मंगलवार, 5 दिसंबर 2017

Shri Ram Katha by Shri Avdheshanand Giri Ji - Day 3(Part lll)

वशिष्ठ जी दशरथ जी से कहने लगे न, न ये मुझसे न होगा। जिनको वेद भी न जान सके ,नेति नेति कहकर रह गए मैं उनका नाम नहीं रख सकता। दशरथ जी कहने लगे ये तो आपकी  महानता है आप ऐसा कह रहें हैं ,आप तो साक्षात वेद मूर्तिं हैं ,आपके लिए असम्भव क्या है।वशिष्ठ जी की आँखों में आंसू छलछला आये हैं। वह देखते हैं सन्यासियों की पंक्ति में स्वयं शिव खड़े हैं ब्राह्मणों की  पंक्ति में ब्रह्मा जी खड़े हैं सेवकों की पंक्ति में स्वयं इंद्र खड़े हैं देव पुत्रियां ,अप्सराएं ,सुबालाएँ जिस को जहां जगह मिली है वह वहीँ खड़ा हुआ है सब जानता चाहते हैं सबको औत्सुक्य है यह जान लेने का भगवान् का क्या नाम रखा जाता है।

वैसे वेद ने भगवान् का पहला नाम कवि बतलाया है -जो कल्पना करता है मैं एक से अनेक हो जाऊँ ,वह सर्जक है ,सृजनकर्ता है ,कवि है।   

वशिष्ठ ने धीरे से भगवान् के चरण छूते हुए कहा-गंगा यहीं से निकलीं हैं और बहुत साहस करके भगवान् की नाभि का स्पर्श करते हुए बोले -ब्रह्मा जी इसी नाभि कमल से प्रसूत हुए हैं। फिर और ज्यादा साहस समेट कर भगवान् का  वक्ष स्पर्श करते हुए बोले यहां दुर्वासा की लात के स्वस्ति चिन्ह अभी तक अंकित हैं भगवान् कितने दयालू हैं। 

इनके नाम अनेक अनूपा ,

सो सुख धाम नाम अस रामा। 

मैं इनका नाम कैसे रखूँ -सभी नाम और रूप इन्हीं के तो हैं इनमें बस एक ही बात है इनमें निरंतर वैभिन्न्य हैं मैं कोई एक नाम इनका कैसे रखूँ -गुरु वशिष्ठ मन ही मन सोच रहे हैं। 

राम शासक भी हैं प्र-शासक  भी हैं उपासक भी हैं।मैं इनका कोई एक नाम कैसे रखूँ -ये तो सनातन ब्रह्म हैं। राम का शासन प्रेम से होता है। इस धरती पर प्रेम से ही आप शासन कर सकते हैं।  

जीव की पहली एषणा सुख पाने की है।सारा संग्रह ,सारा   भंडारण  हमारा किसलिए है ?पदार्थ का संग्रह क्यों है इतना ?सुख पाने के लिए ही तो है।सुख पदार्थ सापेक्ष नहीं है। 

 सुख और   प्रसन्नता ज्ञान सापेक्ष है ,चिंतन सापेक्ष है. स्थाई प्रसन्नता वैराग्य से आएगी। तो कोई जीव यह जानना चाहें के सुख कहाँ है तो सुख राम नाम में है।  

सुख राम नाम में है। 

सीता जी आत्म  हत्या  करने पर उतर  आईं ,राम के वियोग में वह इतनी  त्रस्त  हो गईं अब राम नहीं आएंगे ,मैं भी सती  की तरह भस्म हो जाऊंगी।देह त्याग दूंगी।  तब अचानक एक नाम उनके कान में पड़ा। पुनरुक्ति करने लगीं वह ,आनंद में डूब गईं। 

रामचंद्र गुण बरनहिं  लागा ,

सुनते ही सीता कर  दुःख भागा। 

हनुमान ने कहा ये तो अग्नि कुंड  तैयार कर रहीं हैं लकड़ी बीन समेट कर।  आत्मदाह के लिए तैयार हैं।  तब उन्होंने राम के गुणों का बखान किया जिन्हें सुनकर सीता जी संताप मुक्त हो गईं । 

ईश्वर अंश जीव अविनाशी ,

चेतन अमल सहज सुख राशि। 

अपने स्वरूप को देख अखिलानंद है परमानंद है ये । आनंद ही आनंद है किस दुःख की बात करता है। बुद्ध और उनके अनुयायी संसार में दुःख ही दुःख देखते हैं। आदि शंकराचार्य कहते हैं किस दुःख की बात करता है निज स्वरूप को देख -सच्चिदानंद है वहां -आनंद ही आनंद है।जब कभी दुःख आये तो राम को याद करना। आवरण को नहीं निज स्वरूप को देख। देह को संसार को मत देख ये तो निंदनीय है ही और इसमें है भी क्या मल मूत्र के अलावा। 

राम के नाम को जपने का जो फलादेश है वही ॐ को जपने का है। राम में रकार है ,अकार है और मकार है। रा कहते ही मुंह खुलेगा और म कहते ही बंद  हो जाएगा। ऐसा ही ॐ के उच्चरण में होगा।  
राम तारक मन्त्र है जिसकी जिभ्या के  अग्र  भाग पर यह मन्त्र (यह नाम ) नाँचता रहता है वह दोबारा जन्म नहीं लेता। -जीव जगत और जगन्नाथ का यही भेद है यही अंतिम ज्ञान है पार्वती और ये मुंड माल जो मैं धारण किये रहता हूँ यह किसी और की  नहीं तुम्हारी  ही है। सृष्टि का अंतिम ज्ञान जान लोगी तो दोबारा देह को भस्म नहीं करना पड़ेगा और वह महामंत्र ,गुरु मंत्र राम है।यही कहा था शिव ने पार्वती से बार बार उनके सृष्टि का भेद क्या है पूछने पर।  

राम सनातन सत्य है मंत्र है। आश्चर्य में भी ,कौतुहल में भी ,किसी दुष्ट पुरुष की अधमता को देखकर भी किसी अत्यंत निकृष्ट प्राणी को देख कर भी उसके अति निकृष्ट कृत्य को देखकर भी और हमारे  मुख से निकलता क्या है -यही राम राम राम ही तो निकलता है विभिन्न भावों के साथ । प्रसव की पीड़ा के समय भी यही नाम प्रसूता के मुख से निकलता है और अर्थी के साथ शवयात्रा में भी यही नाम जाता है -राम नाम सत्य है सत्य बोलो गत्य (गति )है। मजदूर जब माथे का पसीना पौछते हुए सुस्ताने बैठता है तो उसके मुख से भी यही शब्द निकलता है- हे! राम।

तो राम एक मंत्र है।महामंत्र है।  

राम और भरत में रूप साम्य इतना है के बचपन में ये दोनों आपस में बदल जाते थे। केवल आँखों से भेद पता चलता है। भरत की आँखों में दासत्व का नित्य ही एक सेवक का भाव है। किम करोति  अपेक्षति -मुझे क्या करना है मेरे लिए क्या आज्ञा है जैसे पूछ रहे हों। आज्ञा की उत्सुकता है जिनकी आँखों में वह भरत हैं।सेवकत्व है जिनमें वह भरत हैं। 

परिये प्रथम भरत के चरना ,

जासो नियम व्रत  जाए न बरना।

 भरत कभी भी नियम नहीं तोड़ते। तुलसीदास कहते हैं यदि मुझसे पूछा जाए पहले पूजा उपासना किसकी करोगे तो मैं कहूंगा -भरत. जो मन क्रम वचन से एक हैं वह भरत हैं धर्म का सार हैं। जिनमें सन्यासत्व और निरंतर वैराग्य है वह भरत हैं। 

भरत तो धर्म का सार ही हैं -मनसा वाचा कर्मणा एक ही हैं।  

और जिनके नेत्रों में गाम्भीर्य है औदार्य है स्वीकृति है वह राम हैं।सबको अपना बनाने के लिए जो भाव है जिनके नेत्रों में -वह राम हैं।नेत्रों में देखने से ही दोनों का भेद पता चलता था इनके बचपन में।  

जो अपनी उपलब्धियों में दूसरों को यश दे दूसरों को कारण माने ,यश दे वह शत्रुघ्न  है।जो सबको प्रेम देता है करुणा देता है।मान सम्मान आदर देता है शत्रुघ्न  है।जिस की वाणी वेद वाणी है जो वेदों के मर्म को जानता है वह शत्रुघ्न है।   

जाके सिमरन से रिपु नाशा 

नाम शत्रुघन वेद प्रकाशा। -------

जो अपने शत्रु का पहचानकर पहले उसका हरण करता है।उसका निवारण कर दे वह  निर्वैर है।शत्रुघ्न है। हमारा आलस्य ,हमारी जड़ता वही हमारा सबसे बड़ा शत्रु है। जो इस जड़ता का प्रमाद का  नाश कर दे वही शत्रुघ्न है।  

जो साक्षात वेदमूर्ती है ,ज्ञान मूर्ती है शांत है ,सौम्य है ,विनम्र है ये निरंतर आज्ञा का पालन करेगा। ये बालक शत्रुघ्न है यही नाम रखा था वशिष्ठ जी ने क्रम भंग करते हुए सबसे छोटे बालक का । 

सुमित्रा से कहा था राम और भरत के नामकरण के बाद -सबसे छोटे बालक को लाओ -सुमित्राजी ने गौरांग लक्ष्मण  जी को आगे कर दिया वशिष्ठ बोले ये नहीं इसे बाद में पहले सबसे छोटे को लाओ।सबसे छोटे के नामकरण के बाद - 

जब गौरांग बालक को सुमित्रा ने आगे किया वशिष्ठ जी उसे अपने अंक में भर कर उसका माथा चूमते रहे उसे अंक से लगा लिया। उसकी हथेलियों पर चुम्बनों की बौछार कर दी। बोले ये बालक सब लक्षणों का धाम है।जितने भी शीर्ष श्रेष्ठ गुण हैं सब इस बालक में हैं।  राम सबके बिना रह सकते हैं इसके बिना नहीं ये बालक तो राम की शैया है।हाँ एक बार को राम सीता के बिना रह सकते हैं मातापिता के बिना भी रह सकते हैं लेकिन  लक्ष्मण के बिना नहीं रह सकते। 

और ऐसा कई बार हुआ है जब लक्ष्मी जी विष्णु जी को छोड़कर चली गईं हैं लेकिन लक्ष्मण जी कभी राम को  छोड़कर नहीं गए। एक बार विष्णु जी ने लक्ष्मी जी से जब पूछा तुम मुझे छोड़कर क्यों चली गईं। बोली लक्ष्मीजी आप तो सोते रहते हैं मैं उद्यमी के पास ही रहती हूँ। तब से भगवान् फिर उतना कभी नहीं सोये। एक बार सोये थे तो उस निद्रा में से मधु -कैटब निकल आये। 

 लक्षणधाम रामप्रिय ,सकल जगत आधार ,

गुरु  वशिष्ठ  ने राखा लक्ष्मण नाम। 

भजन किसे कहते हैं -भज सेवायाम। 

भजन क्या है ?गीत गाने का नाम भजन है क्या ?उसकी कायनात की सेवा वृक्षों ,पक्षियों जीव जलाशयों की सेवा भजन है । इसलिए राम इसे प्रेम करते हैं  और ये अपने को शिशु मानता है। अबोध शिशु ,नवजात शिशु मानता है अपने को। इसलिए गुरु ने इसका नाम लक्ष्मण रखा।

गुरु  वशिष्ठ ते राखा लक्ष्मण नाम  उदार। 

और अब आइये गुरु के गृह चलते हैं -

गुरु गृह गए पढ़न  रघुराई ,

 अल्प  काल विद्या सब पाई। 

गुरु के आश्रम में अमात्य ,साहूकारों कृषकों के बालकों के बीच में ही राम भी बैठकर पढ़ते हैं । उसी  बिछौने पर पल्लवों का बिछौना जिस पर सब बालक बैठते हैं । शिष्य के पास एक ही चीज़ होनी चाहिए -श्रद्धा। 

श्रद्धावान लभते ज्ञानम्। 

गुरु के पास जो कुछ भी है उसका वह अधिकारी बन जाता है  श्रद्धा से । । गुरु ने एकांत में आसन पर बिठाया और ब्रह्म ज्ञान की दीक्षा दी राम को। 

गुरु ने कहा मैं एक ज्ञान केवल राम को दूंगा और वहां से शेष सभी को हटा दिया -लक्ष्मण को ,भरत ,शत्रुघ्न को। 

विश्वामित्र का उद्धरण आता है एक बार विश्वामित्र नंगी तलवार लेकर वशिष्ठ जी की हत्या करने उनके आश्रम में गए :

अरुंधति वशिष्ठ जी से कहतीं हैं ऐसा आह्लाद ऐसा माधुर्य मैंने आश्रम में पहले कभी नहीं देखा। आज लगता है झड़े हुए पीले पाँतों को भी उठाकर चूम लूँ। मुझे अपने आश्रम के आँगन की धूल अपने माथे से लगाने को क्यों मन करता है ?मुझे हर चीज़ अति मोहिनी ,अति उदात्त ,भगवदीय लग रही है। आनंद मुझसे संभाले नहीं सम्भल रहा है हमारा घर तीरथ हो गया हिमालय हो गया। ऐसा मुझे क्यों लग रहा है ?हमारे पेड़ ये देव आत्मा  दिख रहे हैं परमात्मा दिख रहे हैं।

जानती हो ऐसा क्यों हैं ?ये विश्वामित्र की तपस्या का फल है। उनका तप इतना बड़ा हो गया है। अरुंधति कहतीं हैं मुझे ले चलो उन ऋषियों के पास मैं उनकी चरण रज लेना चाहती हूँ।

अरे ये तो एकांत में भी मेरे गुण  गा  रहे हैं और मैं इनकी हत्या करने आया था। उनके हाथ से खड्ग गिर गई। 

अध्यात्म अश्त्र को छीन लेता है। इस धरती को आध्यात्मिक बनाइये युद्ध उन्माद अपने आप कम हो जाएंगे। 
जिसे चिंता रहती है अवसाद रहता है वह अपने घर में एक पुस्तक योग-वशिष्ठ ले आये। यागावशिष्ठ ले आये। नित्य उसे पढ़े जिसमें भगवान् और वशिष्ठ ऋषि के संवाद हैं। ब्रह्म के और उस गुरु के क्या संवाद हुए इसे पढ़कर आपके घर के सारे अभाव दुःख दैन्य दूर हो जाएंगे। अद्भुत  ग्रन्थ है वह।

गुरु गृह गए पढ़न रघुराई 

अल्प काल विद्या सब पाई  . अल्प काल का अर्थ है श्रद्धा से भरा हुआ अंत :करण  है विद्या अपने आप आ जायेगी।

रावण ने मारीच ,सुबाहु ,ताड़का आदि को भेजा था जहां अस्त्र शस्त्र का भण्डार है। सिद्ध आश्रम है। युद्धशाला है जहां अस्त्र शस्त्रों का निर्माण होता है सारा अध्ययन  है जहां उसे नष्ट करने वहां व्यवधान पैदा करने ताकि ऋषियों का ध्यान भंग हो भय पैदा हो उनके अंदर। भय होगा तो ध्यान नहीं लगेगा।ध्यान नहीं लगेगा तो अनुसंधान नहीं होगा। राम को सारे अस्त्र ऋषियों ने दिए है अस्त्र विद्या ऋषियों ने सिखाई है। और यह सब बहुत सायलेंट होना चाहिए किसी को पता नहीं लगना चाहिए।ऐसी हिदायतें देकर रावण ने दूत दूतियों को भेजा था सिद्ध आश्रम।  

प्रतिभा भय ग्रस्त व्यक्ति की  घटने लगती है भय एकाग्रता को छीनता  है।प्रतिभा को कुंद करता है। 

विश्वामित्र जिस  ढ़ंग  से  बढ़े चले आ रहे हैं। आज कुछ मांगने आ रहे हैं । याचक की भूमिका में हैं । अयोध्या की तरफ़  बढ़े चले आ रहे हैं। विश्वामित्र सतो गुण है ताड़का तमो गुण है और तमो गुण ऋषियों को परेशान करता है।

राम चाहिए मुझे दशरथ से कहने लगे विश्वामित्र।मुझे एक राजपुत्र चाहिए जिसे देख कर वह ठीक हो जाएँ। मुझे चाहिए राम और लखन। जब राजपुत्र जाएगा तो ये सन्देश जाएगा राजपुरुष तैयार हो गए हैं और राम सिर्फ राज पुरुष नहीं हैं। सिर्फ राजा नहीं हैं अवतार हैं। राक्षसों का विनाश करने आये हैं। 

एक ही बाण प्राण हर लीन्हां ,

दीन  जान निज पद दीन्हां।

भगवान् के एक ही  बाण ने ताड़का के प्राण हर लिए उसका त्राण कर दिया। तारण कर दिया ये जानकर ये तो दूती है एम्बेसेडर है भगवान् ने उस पर करुणा कर दी। 
मारीच को दूर भेजा था एक ही बाण से सन्देश दे देना रावण  को मैं आ गया हूँ। मारा नहीं है मारीच को करुणामय करुनानिधान राम ने सौ योजन दूर फेंका है बस -अपने बाणों से। 
श्याम गौण सुन्दर दोउ भाई ,

विश्वामित्र महानिधि पाई। 

भगवान् की करुणा से ही सारे शस्त्र गिर गए। स्थविर : अरे ठहर जा मैं तो ठहरा हुआ हूँ तू भी तो ठहर जा। ये एक ही शब्द तो गया था कान में अंगुलिमाल के बुद्ध का और उसके हथियार वहीँ गिर गए। हिंसा सारी  समाप्त हो गई।
चरित्र से स्वभाव से आप सारे संसार को जीत सकते हैं प्रभाव से आप ऐसा नहीं कर सकते। 

स्वभाव दिखाओ सब लोगों को अपना ,स्वभाव से जीतो सबको राम ने कोई अपना प्रभाव नहीं दिखाया -स्वभाव से ही सबको जीता। स्वभाव से ही ताड़का का तारण और वह सारा सिद्ध -आश्रम निष्कंटक हो गया। क्योंकि अपराधियों को अभय दान दे दिया वे अनुचर बन गए। (ज़ारी ...)   

  सन्दर्भ -सामिग्री :

(१ )

LIVE - Shri Ram Katha by Shri Avdheshanand Giri Ji - 28th Dec 2015 || Day 3

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(२ )


3:25:43

LIVE - Shri Ram Katha by Shri Avdheshanand Giri Ji - 28th Dec 2015 || Day 3


Sanskar TV
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Shri Ram Katha by Shri Avdheshanand Giri Ji - Day 3(Part lV)

स्वभाव से जीतिए सबको प्रभाव से नहीं-

चरित्र से ही आप किसी को जीत सकते हैं अपनी सत्यनिष्ठा से ही आप सबको अपना बना सकते हैं।स्वभाव दिखाइए विनम्र बनिए। राम ने कोई प्रभाव नहीं दिखाया अपने  स्वभाव से ही ताड़का का तारण किया और वो सबके सब अनुयायी बन गए। वह समूचा सिद्ध -आश्रम निष्कंटक हो गया क्योंकि अपराधियों को अभय दान दे दिया गया   वे सब अनुयायी बन गए। 

राम पहली बार जंगल को निकले -वृक्षों पर लटकती हुई लताएं  तमाल के वृक्ष जम्बू तमाल पाकर रसाल ,तितलियाँ भ्रमर  फूलों पर मंडराते हुए।राम आह्लादित हैं वन में। 
आज पूरी दिल्ली सारे हमारे महानगर परेशान हैं  आज गौरैया कहीं नहीं हैं ,गिद्ध नहीं हैं ,जुगनू नहीं हैं तितलियाँ नहीं हैं भ्रमर नहीं हैं झींगुर नहीं हैं किसकी वजह से -मोबाइल टावर से निकलने वाली तरंगों  की वजह से -जिसने  गौरैयाओं   को मार दिया। अन्न  की पोषकता गई पुष्पों की गंध गई।अन्न की पाचकता गई सुरति गई सुगंध गई।  

राम पीछे -पीछे दौड़ रहें हैं मृगछौनाओं के। राम संतों सन्यासियों के दर्शन कर बहुत आनंदित हैं यहां वन प्रांतरों में सरोवर हैं उनमें में राजहंस हैं । और सहसा राम चकित से रह गए एक आश्रम को देखकर। अभी तक तो राम बहुत आह्लादित थे। लेकिन एक आश्रम ये इतना  सूना है यहां सरोवर तो  है  उसमें नीर नहीं है । आश्रम में एक भी  पंछी परिंदा वृक्ष नहीं है और एक शिला है जो सिसक रही है। रो रही है। राम परेशान है शिला कैसे रो सकती है सिसक सकती है ,पत्थर को आंसू कैसे आ सकते हैं ? 

आश्रम एक ,देख मग माहिं  

खग मृग जीव  जंतु तहँ  नाहिं ,

पूछा मुनि शिला एक देखि ,

सकल कथा मुनि कही विशेषी। 

यही तो शाप दिया था गौतम ने। और इसीलिए यहां वनस्पति नहीं हैं सुगन्धि नहीं हैं जीव जंतु नहीं हैं। 

कृन्दन चीत्कार करती रहना जो तूने वृक्ष लगाए हैं फलदार सब ठूंठ बन जाएंगे। जिन पंछियों को रोज़ चुगना देती है कभी नहीं आएंगे अब लौटके । तू शिला बनके यहां अकेली सिसकती रहना धूप में तप्ती रहना। तू देखने में तो चट्टान जैसे दिखेगी लेकिन तेरी सारी  संवेदनाएं मानुषी जैसी ही रहेंगी मानवीय ही रहेंगी।  तू धूप में तप्ती रहना वर्षा में भीगती रहना।ओस और धूप तेरी त्वचा को झुलस देंगे।  अपनों को ऐसा शाप देना इतना दुःख देना।इतना दुःख देता है कोई अपनों को। यही तो किया था गौतम ने। 

अहिल्या ने बहुत कहा मैं निरपराध हूँ निर्दोषी हूँ। वह हठी है -योगी। गौतम ने कुछ सुना ही नहीं वो कहने लगे -तुझे परपुरुष का स्पर्श ही नहीं पता चला यह कैसे हो सकता है ?अनिंद्य है अहिल्ल्या। 

अहिल्ल्या निर्गन्धा थी जिसने अपनी लालसाओं को कामनाओं को अपने वश में कर लिया था ।एक अलग ही ओज था उनमें। इसीलिए इंद्र भी उन पर मोहित था।

मनुष्य की तीन प्रकार की एषणाएँ हैं :

(१ )वित्तेषणा 
(२ )पुत्रेष्णा 
(३ )लोकेषणा 

अहिल्या ने तीनों को जीत लिया था। अनिंद्य सनातन सतोगुणी सौंदर्य था उनमें। जिसने अपनी एषणाओं को जीत लिया है उसके द्वार पर देवता दौड़े चले आते हैं। सिद्धियां उसका द्वार खटखटाने लगतीं हैं। अहिल्या ने काम जीत लिया था। पर -पुरुष का कभी ध्यान नहीं करतीं थीं अहिल्या। वो चाहिए भी नहीं। 
काम का अर्थ कुछ इन्द्रियों की गुदगुदी नहीं है। संसार की सब सुखद वांछाओं का नाम काम है। तो किसी ने इन्हें नियंत्रित कर लिया ,बड़ा सुन्दर लगता है वह आदमी। उसमें बड़ा आकर्षण आ जाता है बड़ा मोहक लगता है वह आदमी।

एक अलग प्रकार का विमोहन रहता है उसमें सब खींचे चले आते हैं। इंद्र ने एक बार उन्हें देखा तो सभी शची ,अप्सराएं उनके सामने लज्जित होने लगीं।

इंद्र का षड्यंत्र छलकपट मायाजाल 

 चाकर से कहा चंद्र से तू मेरा साथ दे। अर्द्ध रात्रि में कुकुट्ट बनकर मुर्गा बनकर बांग दे। भोर के स्वर पैदा करना मुर्गा बनकर। ऋषि की आँख खुल जायेगी। 

और ऐसा ही हुआ। और बड़े लज्जित हुए ऋषि। जानते हो कब लज्जित होता है ऋषि जब पूजा न कर पाए ,माला न फेर पाए।  नित्य नैमित्तिक पाठ न कर पाए। गौ ग्रास न निकाल पाए। जो सात्विक नियम हैं जब उनका निर्वहन नहीं होता अपराध बोध सालता है वह गिल्ट कुछ और किस्म की गिल्ट है। 

अरे !आज मेरी आँख क्यों नहीं खुली ,मैंने ऐसा रात  को क्या खा लिया ,किसका संग साथ कर लिया जो ब्रह्म मुहूर्त में  मेरी निद्रा न खुली।मैंने कौन सी ऐसी बात सोची है रात भर जो मेरी आँख नहीं खुली। हड़बड़ा कर उठे गौतम और एक वस्त्र लेकर  गंगा की ओर  भागे। 

और वैसे ही  गौतम की  कुटिया में इंद्र आये - वैसा ही उनका रूप आकृति ,वैसी ही भाषा   .छद्म गौतम बन गए इंद्र।

उन्होंने आवरण भंग किया। ,अपना कोई आवरण भंग करेगा तो कैसे करेगा। 'काम' योग का नाम है। भोजन लेना योग है। भोजन में भी जल में भी संयम शान्ति रखना है ,जल  चबाया जाए, औषधि बन जाएगा। हड़बड़ी में ध्यान कहीं और है बुद्धू बक्सा सामने है भोजन कर रहे हैं। ये भोग हो गया। निद्रा योग का नाम है सांस लेना भी योग का नाम है। 

गौतम मुख  पर से आवरण कैसे भंग करेंगे -जिस तरह से छद्म गौतम ने आवरण भंग किया वह सहम गईं उठके बैठ गईं और जिस वक्त इंद्र ने उनका हाथ छूआ उनके सारे शरीर में अग्न दौड़ ने  लगी। 

उधर गंगा किनारे गौतम को लगा कोई छल  हुआ है चन्द्रमा धीरे से प्रकट हो रहा है मुर्गे में से और इंद्र हाथ छू रहा है अहिल्या का  -

सहसा स्वामी पति गौतम द्वार पर -वह नैनों में गौतम के देख कर पहचान गईं अपने स्वामी को।  

इंद्र के हाथ में कम्पन है।अब तेरा इन्द्रत्व गया। कोई नहीं बचा सकता ऋषि कोप से। 

 इंद्र तू कोढ़ी हो जाएगा तेरे सारे अंग गल- गल कर गिरेंगे-गौतम शाप देते हैं।  

क्रोध से मारक कोई और हिंसा नहीं है। स्त्री पर जो स्वामित्व है यह  पशु भाव है आपका -यह मेरे अधीन हैं वैसे ही नाँचेगी जैसे मैं चाहूँ। जब आप वर्चस्व के अधिकार में हैं और इसे कोई छीन रहा है भीतर का  पशु जग जाता है तब । गौतम ने इतना  भयानक शाप दे डाला। वे शाप देते जा रहें हैं अहिल्या चीखती जा रही हैं । वह कहती है मैं सब सह लूंगीं मेरा त्राण का उपाय भी तो करो ये कौन बताएगा स्वामी मैं  पवित्र हूँ। कौन प्रमाणित करेगा मैं निर्दोष हूँ। आप तो मानते नहीं। 

पति तो पवित्रता का प्रमाण माँगता है। कौन प्रमाणित करेगा के मैं पवित्र हूँ मेरा उद्धार कौन करेगा।तब सहसा उनके भीतर की करुणा जगी और वह यह कह गए - 

जब इस गली से राम निकलेंगे तो उनका ध्यान तेरी तरफ जाएगा। ईश्वर ही प्रमाणित कर सकता है हमारी निरपराधता को। बरसों से भीगती वह शिला -जब राम उधर से गुज़रे उनका ध्यान गया उस पर -चट्टान सिसक रही है। 

गुरु ने कहा  यह गौतम नारी है आपके चरण की रज चाहतीं है। गुरु की आज्ञा है राम सकुचाते हैं यह ब्राह्मणी है मैं चरण रज कैसे डालूँ। 

मेरी आज्ञा है उठा अपना पैर कहा  गुरुदेव ने -और जैसे ही भगवान के चरणों की धूल गिरी वह शिला कल्याणी हो गई। वह पाषाणी कल्याणी हो गई। 

गौतम नारी शाप वश उपल देह  धर -धीर ,

चरण कमल रज चाहती कृपा करो रघुवीर। 

अति प्रेम अधीरा -

राम ने कहा तो पूज्या है पवित्रा है ,पतिव्रता है। मैं प्रमाणित करता हूँ और जा -तू निर्वाण को उपलब्ध होगी। उसने कहा न मुझे तेरा धाम भी नहीं चाहिए मुझे मेरा पति जैसा भी है उसका साथ चाहिए -वे तिल - तिल मर रहें होंगे उन्होंने कभी इससे पहले क्रोध नहीं किया था। क्रोध के बाद खुद का पता नहीं रहता व्यक्ति बिखर जाता है। क्रोध के बाद फिर से पूरा अपने को समेट भी नहीं पाता। क्रोध विजातीय है वह भीतर रहना भी नहीं चाहता। कोई चोबीस घंटों रह कर दिखाए क्रोध में। 

प्रेम में व्यक्ति 24 x 7 रह सकता है क्रोध में नहीं भले वर्ल्ड रिकार्ड बना के दिखाए कोई । स्त्री के सकल व्रत का फल अन्य को मिलता है उसके परिवार को भाई को पुत्र को ,पति को मिलता है। यह भारत की नारी ही  है। जो भगवान् से भी अपनों का सुख मांगती है स्वयं का मोक्ष नहीं।   

 और फिर अति आद्र होकर अहिल्या ने कहा था -स्वामी मुझे मेरी मुक्ति का तो मार्ग बता दो। 

दिन भर कोई आपसे न बोले तो पत्थर जैसे हो जाओगे। बुत बन जाओगे।प्रेम अपनों से चाहिए दूसरों से नहीं। संवेदनाएं  अपनों  से ही  चाहिए। दर्द भी हमारे अपनों से हैं। हमारी कोई प्रसन्नता है तो अपनों से है। दुःख दर्द में अपने ही याद आते हैं।     

 सन्दर्भ -सामिग्री :


(१)LIVE - Shri Ram Katha by Shri Avdheshanand Giri Ji - 28th Dec 2015 || Day 3
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शनिवार, 2 दिसंबर 2017

LIVE - Shri Ram Katha by Shri Avdheshanand Giri Ji - Day 3 (Part l )

राम कथा मंदाकिनी ,चित्रकूट चित चार चारु ,

तुलसी  सुभग  स्नेह वन श्री रघुवीर विहार। 

ये चित्त ही संसार है इसके प्रयत्न पूर्वक शोधन का काम राम कथा करती है अगर चित्त कथा से जुड़ा है ,संसार कहाँ याद आता  है। जब चित्त बदलता है तो चरित भी बदल जाता है। ये जितने भी आप चित्र बैठे हैं ये सब चित्रकूट हैं। और इनके भीतर चारु चित्त -जब आप कथा सुनने आये हैं  तो आपके चित्त का शोधन होगा ही। जब चित्त बदल जाता है तो मानव का धीरे धीरे चित्र (जेस्चर बैठने का )भी बदल जाता है। चित्र बदलता है तो चरित भी बदलता है।

सुरतीय नरतीय नागतिय, सबहि के मन होय 

गोद  लिए हुलसी फिरै के ,तुलसी सो सुत होय। (तुलसी की माँ का नाम हुलसी था )

(अब्दुर रहीम खान खानी )-तुलसी ने राम कथा दी जिसे सुनकर लाखों  तर गए।सुत हो तो तुलसी सा हो जिसने उतने  लोगों को  तार दिया जितने  तोआकाश में तारे भी नहीं हैं।  

जेते तुम तारे ,तेते नभ में न तारे  -वो कथा आप सुन रहें हैं जिसे सुनकर लाखों तर गए। 

जहां राम कथा सुनी जाती है वह परिसर आनंद वन बन जाता है। आँखें बंद करो तो आपको सिया और राम दोनों दिखाई देंगे। वह दोनों आपको देख रहें हैं -दूसरी तरफ मन गया तो राम जी भी मुंह फेर लेंगे,इसीलिए मन को कथा में एकाग्र रखो और राम में मन रहा तो आपका मन रम जाएगा। और राम कैसे हैं ?

सर्वाधिपत्यं -वह राम व्यापक भी है अयोध्या का राजा भी है। जब वह व्यापक होता है तो कैसा होता है :

एकहुवशी - 

सर्व रूप आत्माओं को उसने अपने वश में किया हुआ है। जब वह व्यापक हो जाता है तब वह दशरथ पुत्र ही नहीं रह जाता है। ऐसा भगवान् जो सारे संसार पर शासन करता है उस राम को देखने की यह दृष्टि कथा से मिलती है। राम कथा विपदा व्यथा का हार्न कर लेती है। 

जो परमात्मा चाहता है वही तो होता है तभी तो हम -

एकहुवशी हैं। सारे संसार को भगवान् अपनी शरण में रखते हैं। राम कथा सुनने के बाद दोष दर्शन मिटता है। 

 जफ़र साहब का शैर है :

न थी हाल की, जब हमें अपनी खबर ,

रहे देखते औरों के एब-ओ -हुनर  

पड़ी अपनी बुराइयों पे जो नज़र ,

तो (दुनिया )नज़र (निगाह ) में कोई बुरा न रहा। 





ये राम कथा तन को पुष्टि ,मन को (संतुष्टि )तुष्टि और बुद्धि को दृष्टि देती है।यह कथा मानव की  देह से आपको ब्रह्म की देह तक ले जाती है।  

सन्दर्भ -सामिग्री :

(१ )https://www.youtube.com/watch?v=kxb17bPyUpM

Shri Ram Katha by Shri Avdheshanand Giri Ji - Day 3 (Part ll )

शास्त्र कहते हैं धन्य वही है जिसने अपने मनोविकार जीत लिए हैं। जहां 'परदोष -दर्शन 'का अभाव है वहां ऐसी सामर्थ्य पनपने लगती है।जिसकी प्रकृति में अनिन्दता आ गई है वही ईश्वर को प्रिय है। स्वयं भगवान् कहते हैं अनेक स्थानों पर ,मैं उसका अनुगत हो जाता हूँ जहां अहमन्यता खो गई है। जहां करता पन का भाव और अहंकार साधक से दूर चला गया है। मैं ऐसे साधक के अनुगत हो जाता हूँ। जिसका अंत :करण द्वेष रहित है। 

किसी की उन्नति ,उच्च पदस्थता अज्ञानी के मन में द्वेष पैदा करती है।अकारण ही ईर्ष्या पैदा हो जाती है।  दूरियां वहां दिखतीं हैं जहां अज्ञानता है। इसलिए किसी के उन्नयन ,उन्नति ,उत्कर्ष में अज्ञानी ईर्ष्या से भर जाता है। द्वेष उसके पास रहता है। अज्ञान की अवस्था में हम अधिक अपेक्षा करने लगते हैं। उनसे जिनके पास सत्ता है अधिकार हैं विभूति है,वैभव है सम्पदा है ।और कभी कभी तो बिना पात्रता के ,सामर्थ्य के साधना के हम सब कुछ पा लेना चाहते हैं। ज़रा ऐसे मन की कल्पना तो करके देखिये ,जिसके पास न साधन हैं न पात्रता न अधिकार ,न श्रम लेकिन अपेक्षा इतनी है ,उनके पास से सब कुछ मिले तत्काल मिले उसे जिनके पास अधिकार हैं साधन हैं वैभव हैं सम्पन्नता है सत्ता है ।

ये अज्ञानी मन है। 

जो अधिक अपेक्षाएं करता है। 

और अगर आप अपने पास अधिक दुःख देखना चाहें ,दैन्य ,त्रास अभाव देखना चाहें तो वह इस कारण है ,हम अधिक अपेक्षा कर  रहें हैं दूसरों से।जिनके पास अधिक विभूतियाँ हैं वैभव हैं सत्ता है उनसे हमारी अपेक्षाएं हैं। और ध्यान रहे जो हमसे अधिक नहीं है उसकी उपेक्षा है।अज्ञानी मन वह है जो बहुत उपेक्षा करता है उनकी जिनके पास बहुत  साधन नहीं हैं। 

वो मुझे अपने कद के बराबर होने नहीं देता    

कतरे को समंदर  बनने नहीं देता   .

एक चिंता यह भी है वह दौड़ कर मेरे पास न आ जाए। मेरे पास जो है यह लोकसंग्रह इसका न बन जाए।यही अज्ञानी मन है।

शांत वही है जो अजात शत्रु है।    

धन्य वही है जिसने दूसरे का दर्द देखा है। 

परोपकार पुण्याय 

लोगों के कांटे निकालो 

तूने केवल अपना ही दुःख देखा है ,

सचमुच कितना कम देखा है। 

धन्य वह है जो दूसरों के भाव ,भय अक्षमता दारिद्र्य के दर्शन करे।

जो मुझे अच्छा नहीं लगता वह दूसरों के साथ न करूँ। 

और सच पूछो तो राम क्या हैं ?

(अब हम  कथा में प्रवेश कर रहे हैं ) 

जो सद्गुणों को जागृत करती है वह राम कथा है :कथा हमें  श्रेष्ठता प्रदान करती है। धन्यता ,पूज्यता पैदा करती है। 

राम इस राष्ट्र का चरित्र हैं  शील -संयम हैं , सदाचार नैतिकता हैं मर्यादा  हैं । कृष्ण इस राष्ट्र का माधुर्य हैं दर्शन हैं। वह इस देश का कवि है पंडित है ,दार्शनिक है यौद्धा है मनीषी है। 

जग में सुन्दर हैं दो नाम 

चाहे कृष्ण कहो या राम।

राम इस देश की मर्यादा हैं। ऋषि बड़े चिंतित हुए यह जानकर के बहु -उपासनाएँ हमारे आसपास हैं। 

राम बहुत कम बोले हैं मानस में ,उनका कृतित्व है जिससे मर्यादा झलकती  है। सफलतम व्यक्ति वह है जो मुखर नहीं है। उनके अधरों पर मुस्कान और चेहरे पर एक सहज स्वाभाविक मौन रहता है। 

जो बहुत अधिक बोल रहा है ,चपल है ,वह अभी सफलता की ओर है सफल नहीं हुआ है।

सफलता के बाद एक और सीढ़ी है उसका नाम है सार्थकता और उसके बाद भी एक और सीढ़ी है - ,कृतकृत्यता।  आपका जीवन आदर्श बन गया है वह कैसे पता चलेगा। आपके संवाद से पता चलेगा।
इस युग में बहुत बोला जा रहा है सुना बहुत कम जा रहा है।

इस जहां में हर किसी का अपना अपना आसमाँ ,

कह रहा है हर कोई अपने जुनूँ की दास्ताँ। 

जो हम में गहरे आग्रह हैं हठधर्मिता है वह अभिव्यक्त हो रही है हमारी हड़बड़ी में ,प्रतिक्रिया  देने की हड़बड़ी में।

सफलतम व्यक्ति की प्रतिक्रिया से कोई आहत नहीं हो सकता।सफल व्यक्ति वह है जिसे संवाद करना आता है बोलना आता है। बोलना सिर्फ कोई कला नहीं है यह आपका अध्ययन है जो निकल के आता है।

जब भी बोलिये ,वक्त पे बोलिये ,

मुख़्तसर बोलिये ,मुद्दतों सोचिए।

आपका बोलना किसी को समाधान दे ,आदर दे ,उसे लघुता न दे। कागा अतिथि के मन को पढ़ लेता है उसके सकल अंत :करण को अतिथि के आने की आहट  लग जाती है। कोयल अभाव के वियोग के गीत गा  रही है। वह वियोग हमें मीठा लगता है क्योंकि उसे मीठा बोलना आता है। कागा को नहीं आता जबकि वह मिलन की बात कह रहा है अतिथि के आगमन की आहट  बतला रहा है लेकिन उसे मीठा बोलना नहीं आता  हम उसे कंकर मार के  उड़ा देते  हैं।कागा भी उस विरह के स्वर से कभी नहीं रीझता। वह अपने प्रियतम को पुकार रही है बालक को ढूंढ रही है वह हूक है उसकी लेकिन उसे वियोग में भी मीठा बोलना आता है। कागा को नहीं आता है। 

वेद कहते हैं बोलना सीखिए।रामकथा हमें बोलना सिखाती है। 

बलि जाऊं  लला इन बोलन की  -तुलसीदास आगे चलके कहते हैं। 

हमारे नैन पहले बोलते हैं ,रोम बोलते हैं।रोम -रोम बोलता है हमारा।  रोमकूप से स्वर निकलते हैं ,स्वेद बोलता है हमारा । पूरा शरीर बोलता है हमारा। 

हृदय की अपनी भाषा है।

 बुद्धि की अलग भाषा है। 

इसी से नवरस पैदा हुए हैं।नवरसों की कल्पना पैदा हुई है। 

तो एक बड़ा व्यक्तित्व आपको बनाना है और व्यक्तित्व भी 

चार प्रकार के हैं :

(१ )एक आपका जड़ व्यक्तित्व है 

(२ )भौतिकीय  व्यक्तित्व -वर्ण ,कपोल ,देहकांति ,आपके नैन -नक्श ,केश , आकृति ,वस्त्र ,आभूषण आदि यह आपका बाहरी व्यक्तित्व है। 

(३ )सूक्ष्म या भावुक व्यक्तित्व -इससे गुरु परम्परा ,भाषा ,अध्ययन ,आपके चिंतन आपके सारे संस्कार ,आपकी स्थिति आदि का बोध होता है। 


(४ ) आध्यात्मिक व्यक्तित्व -जिसमें व्यक्ति अन  -अपेक्ष  रहता है।स्वाभाविक रूप से संयमित रहता है इसमें व्यक्ति ,भावुक नहीं होता है । शांत रहता है। याचक नहीं होता है। 

एक आत्म व्यक्तित्व है जो आप स्वयं हैं ।  

एक आपका बाहरी व्यक्तित्व है जो आपके वस्त्र ,आभूषण ,वर्ण से प्रकट होता है एक आपका सूक्ष्म  व्यक्तित्व  है। 

वह मुखर होता है जब आप बोलते हैं। तब आपका बाहरी व्यक्तित्व गौण हो जाता है । भाषा से आपके बोल से आपका अध्ययन प्रकट हो जाता है चिंतन सामने आ जाता है। संस्कार आपकी स्थिति सामने आ जाती है। 

तुलसीदास ने राम के कम बोलने  से आरम्भ की है बाल (बाल्य )कथा -भगवान् के बाल रूप  की बाल लीलाओं का बखान करते हुए तुलसीदास लिखते हैं :

वरदंत की पंगत कुंद  कली ,

अधराधर पल्लव खोलन की। 

चपला चमके घन बीच जगे ,

छवि मोतिन  माल ,अमोलन की। 

घुंघरारे  लटा    लटकें ,

मुख ऊपर  ,लोल कपोलन की। 



न्योंछावर प्राण करें  तुलसी ,

बलि जाऊँ लला, इन बोलन की.

जैसे काले मेघों ,मेघाच्छन्न आकाश में अचानक  बिजली चमकती हो  ऐसे ही भगवान् के श्याम वर्ण के मुखमंडल के बीच में बिजली की चमक सी उनकी धवल दन्तावली लगती है जब भगवान मुस्कुराते हैं तब।  

आपके स्वर में देने के भाव हों ,दूसरों के लिए आदर हो ,छीनने की प्रवृत्ति न हो। यही सन्देश है राम कथा का। 


(शेष अगले अंक में .... )






सन्दर्भ -सामिग्री :

(१ )https://www.youtube.com/watch?v=kxb17bPyUpM

(२  )




You are watching Day 3 of Shri Ram Katha by Shri Avdheshanand Giri Ji Maharaj from Indore (M

शुक्रवार, 1 दिसंबर 2017

Shri Ram Katha by Shri Avdheshanand Giri Ji - Day 2 ,Part 4

भगवान् का प्रिय आहार है भक्त का अहंकार। भगवान् इसे रहने नहीं देते नारद समझ गए भगवान् ने मुझे अपनी माया के वशीभूत कर लिया था। नारद शांत हो गए और ध्यान में बैठ गए। 

कथा का सन्देश है :जब कोई व्यक्ति बहुत क्रोध करे तो समझ जाना यह असफल व्यक्ति है ,हार गया है। इससे बचने का सहज उपाय है भगवान् के गुणों को याद करो उस समय। 

पूर्व कथा प्रसंग :

मनुशतरूपा के सफल तप के बद आकाशवाणी का होना -आप दोनों ही कौशल्या और दशरथ होंगे ,मैं आपका पुत्र बनकर आऊंगा लेकिन अभी इंतज़ार करना होगा। 

उधर जय विजय के शाप के कारण भी रावण कुम्भकर्ण(कुम्भ -करण ) का आना और नारद के शाप को भी अंगीकार कर भगवान् का स्वयं भी राम बनकर आने को उत्सुक होना । राम के जन्म के कारण बने। 

आइये चलते हैं अयोध्या जहां समूची वसुंधरा के वैभव का एक मात्र उपभोक्ता राजा दसरथ -जब वृद्धावस्था नज़दीक आ गई -किसे सौंपे ये ऐश्वर्य वसुंधरा का। देवताओं को जब भय होता है मैं छलांग लगाकर स्वर्ग पहुंचता हूँ। वशिष्ठ जी मेरे गुरु हैं। मैं इच्छवाकु वंश का प्रतापी सम्राट -मुझे राजपुत्र नहीं चाहिए ?

मैं उन्मादियों को देख रहा हूँ। मैं देख रहा हूँ रावण को उसके बढ़ते साम्राज्य को ,एक बड़ी विपदा मैं देख रहा हूँ संत विखंडित हो रहे हैं संत सत्ता बिखर गई है आतताइयों के कारण वह एक मत नहीं हैं। एक स्वर नहीं हैं उनका। तो कोई ऐसी सत्ता प्रकट हो जो  इस इह  लोक और परलोक को जोड़ दे। 

आज पहली बार सुमंत नहीं हैं सचिव नहीं है कोई साथ ,सचिवालय नहीं है राजा नंगे पैर  ही चल पड़े हैं गुरु वशिष्ठ के भवन की ओर । सौध पर  खड़ी सुकुमारियाँ राजा को पहली बार   नंगे पाँव चलते देखती हैं पुष्प बरसाती हैं।

नवग्रह जिसके यहां बंदी हैं जो विमानों का अपहरण कर रहा हैं जहां रमणियाँ  ,सुंदरियाँ दिखीं वो उसकी कारा में हैं। उसके रावण के पुत्र ने इंद्र को भी जीत लिया है। 

मुझे एक पुत्र चाहिए। 

वशिष्ठ जी ने कहा -हम पुत्रयेष्ठि यज्ञ करेंगे जिसके  क्रियान्वयन में एक ही ऋषि दक्ष हैं -ऋषि श्रृंगी। मन्त्र मुझे भी पता हैं विधि का बोध मुझे है पर   क्रियान्वयन करने में यदि कोई  दक्ष हैं तो वह श्रृंगी ऋषि ही हैं। 

इस धरती पर एक वस्तु ऐसी है जिससे इह लोक की और परलोक की सकल वांछाओं की सिद्धि की जा सकती है। एक साधन ऐसा है जिससे कुछ भी पाया जा सकता है। पूछा दशरथ ने वह साधन कौन सा है। तो कहा वशिष्ठ जी ने वह गौ माता की सेवा है। 

गाय के दुग्ध को  कैसे विधि पूर्वक दुहा जाए ,कैसे उसकी खीर बनाकर देवताओं को अर्पित की जाए वही जानते हैं। दोनों लोकों की सिद्धि हो जाएगी उसके अर्पण से। 

श्रृंगी ऋषि ने २१ दिन तक यज्ञ किया। 

अगर गौ माता की सेवा विधि पूर्वक कर ली जाए तो सकल वांछाएं पूरी हो जाती हैं इस लोक की भी परलोक की भी। यही एक मात्र साधन है जो दोनों लोकों को जोड़ता है दोनों  की  सम्पदा और ऐश्वर्य को हासिल करवा देता है।  

अगर आपकी अर्चना भगवान् तक नहीं  पहुंच पा रही है मंत्रोच्चार से पैदा स्पंदन और आपकी प्रार्थनाएं देवताओं तक नहीं पहुँच पाती हैं -यकीन मानिये गाय के कान में वह कह दो -गाय के कान की स्ट्रक्चर ऐसी है दूर तक जायेगी वह  ध्वनि  और उसकी गूंज।उसका सम्प्रेषण देवताओं तक हो जाएगा। 

अगर आप बहुत अशांत हैं ,एंग्जायटी आपकी बहुत बढ़ी हुई है ,कोई स्ट्रेस है आपके भीतर ,डिप्रेशन है -गाय की पीठ पर हाथ फेरिये कुछ देर ,गाय की एक दो परिक्रमा कर लीजिये आपका मन शांत हो जाएगा। आपके मस्तक में दुखन है सिरोवेदन है गाय की पूंछ मस्तक से लगा लीजिये। और यकीन मानिये यदि गाय  नथुनों से निकलने वाली श्वास आपकी मुठ्ठी का स्पर्श कर गई ,गाय की जीभ आपकी हथेलियों से छू गई अपार अपूर्व ऊर्जा का संचार हो जाएगा आपके अंदर। 

गाय के मूत्र को उबालकर खोया (मावा )तैयार किया जाता है उबाल कर देख लीजिए यकीन नहीं है तो। और गाय के गोबर के ऊपर जो एक पारदर्शी सफ़ेद झिल्ली होती है हारवर्ड विश्वविद्यालय के  विज्ञानियों ने भी इस तथ्य को सिद्ध किया है वह बादलों का (पानी बरसाने वाले मेघों  ,परिजन्य ,परिजन्यों ) का आवाहन करती है। गोबर की गंध आपके शरीर में यदि रसायनों का  व्रतिक्रम  हो गया है असंतुलन हो गया है सूंघने से संतुलन पुन : कायम हो जाता है। बेशकीमती पदार्थ है गाय का गोबर।गौ रेचन गाय के कान का मेल, विश्व का सबसे कीमती पदार्थ है जिसके स्पर्श मात्र से सिरोवेदन समाप्त हो जाता है बस थोड़ा सा मस्तक से लगा लीजिये। 

परिजन्य वे बादल हैं जो  समानुपातिक  तौर पर बरसेंगें कहाँ कितना वर्षा जल चाहिए उतना ही बरसेंगे। सब को जल समुचित जल मुहैया करवाएंगे। 

कोई स्मृति ह्रास है आपकी जीवन की लय खोती जा रही है ,गौ माता की शरण में आइये। 

हमारी संस्कृति पंच -गकारों  पर भी आधारित है। 

गुरु ,गंगा ,गीता , गायत्री ,गाय। 

अर्पण,  तर्पण , समर्पण -इन तीन शब्दों से बखान हो जाता है भारतीय संस्कृति का। 

बिना इन पांच देवताओं (पञ्च गकारों )के कुछ नहीं होगा  आपके जीवन में । 

गुरु माने परम्परा ,बोध ,मानक,मूल्य , सिद्धांत।

किंचित गीता भगवद गीता ,

गंगाजल और कनिका पीता।  

श्रृंगी ऋषि ने यज्ञ किया  गौ माता के एक एक द्रव्य से। 

दूध ,दूध का आधा भाग दधि ,दधि का आधा भाग घृत ,और घृत का आधा भाग मूत्र और मूत्र का आधा भाग गौ -रज़  (गोबर का रस ).  

एक बात और बाहर कितनी भी प्रचंड गर्मी हो गोबर के अंदर उसकी सफ़ेद झिल्ली के पार ऊँगली डालकर देखिये -गोबर के अंदर का तापमान उतना ही मिलेगा जितना आपने शरीर का  सामान्य तापमान  होता है (३७ सेल्सियस या ९८.६  फारेनहाइट ),और गौ मूत्र का तापमान भी आपके शरीर के तापमान जितना ही मिलेगा। गाय के जो पेट में मूत्र है उसका भी तापमान उतना यही रहता है जैसा आपके शरीर का है।सतह की पारदर्शी झिल्ली भले गर्म हो।  

 पञ्च गव्य बनाकर  शृंगि  ऋषि ने  देव आराधना की -कहा वीर्य कैसे नहीं बनेगा ,गर्भ कैसे नहीं ठहरेगा। हम उस प्रकार की औषधि बनाएंगे ,उस प्रकार की औषधि बनाकर खीर बनाकर राजा के हाथ में दे दी यह कहकर -

खीर के दो हिस्से कर दो। आधा कौशल्या को दे दो। और शेष आधे के दो हिस्से करके एक एक हिस्सा उनमें से कैकई और सुमित्रा को दे दो।

अरुंधति कौशल्या के पास आती हैं।आज कौशल्या अत्यंत सकुचाई सी गुरु माता के चरणों पर पुष्प से अर्क चढ़ातीं हैं।कौशल्या झुकना चाहती हैं  गुरु माता उनका हाथ पकड़कर चूम लेती हैं ।पूछती हैं अपना अनुभव बताओ -कैसा लग रहा है गर्भ काल में। कौशल्या कहतीं हैं  कैकई  से पूछो वह मुखरित रहतीं हैं। 

कैकई बतलाती हैं मुझे महसूस हो रहा है मैं दासी बन जाऊँ ,सेविका बन जाऊं कौशल्या की। मौन रहूं। मैं परम् शान्ति और वैराग्य का अनुभव कर रही हूँ। मेरा पुत्र राम का अनुचर होगा। 

सुमित्रा के पास जातीं हैं गुरु माता -सुमित्रा कहतीं हैं मुझे दो प्रकार की अनुभूति हो रही है -मेरा एक अंश राम का अनुचर होगा ,कभी कभी लगता है हज़ार हज़ार सर्प मेरी काया में पल रहे हैं। एक और मेरा अंश कौशल्या के  पुत्र का अनुगामी होगा। कौशल्या के पास पुन : लौटती हैं गुरु माँ। कहतीं हैं मैं तो तुम्हारा अनुभव सुनने आईं थीं। कौशल्या धीरे से कहतीं हैं जब मैं रात्रि को आकाश-गंगा के तारों को निहारती हूँ मुझे लगता है इनका बनाने वाला मेरे अंदर मेरे गर्भ में है मैं जब चंदा को देखतीं हूँ प्रात : सूरज को देखतीं हूँ मुझे लगता  इसका रचयिता भी मेरे अंदर है। कभी लगता है मैं ही मैं  हूँ  सब जगह और  सब मुझमें ही हैं। गुरु माँ के कान में कहतीं हैं कौशल्या मुझे लगता है संसार का रचयिता मेरे अंदर पनप रहा है।  

भगवान् राम का जन्म हो गया है कथा का शेष भाग अगले अंक तीसरे दिन की कथा में इन सन्देश के साथ :

संत क्या हैं। संत पात्रता देते हैं योग्य बनाते हैं। 

उदारता क्या है ?अगर किसी ने अपराध किया है  तो उसे क्षमा कर दीजिये और उसके गुणों को निहार देखकर उसे सदगुण और भी अपनाने का अवसर दीजिए ,यही औदार्य उच्चता है।  

सन्दर्भ -सामिग्री :

(१ )https://www.youtube.com/watch?v=_1UZvf4IGu8

(२ )

Shri Ram Katha by Shri Avdheshanand Giri Ji - 27th Dec 2015 || Day 2

गुरुवार, 30 नवंबर 2017

Shri Ram Katha by Shri Avdheshanand Giri Ji Day 2(Part ll ,lll )

Shri Ram Katha by Shri Avdheshanand Giri Ji  Day 2(Part ll ,lll )

संदर्भ -सामिग्री :

(१ )https://www.youtube.com/watch?v=_1UZvf4IGu8

(२)

LIVE - Shri Ram Katha by Shri Avdheshanand Giri Ji - 27th Dec 2015 || Day 2


अध्यात्म का अर्थ है जो स्वभाव की ओर लेकर आये जिससे अपने स्वरूप का बोध हो। जब व्यक्ति अपने स्वभाव को उपलब्ध होता है तब उसके पास भगवदीय सामर्थ्य उजागर हो जाती है। हमारी संस्कृति नर से नारायण बनाने वाली संस्कृति है। 

वेद के अनुसार यह कहा गया -अमृतस्य पुत्रा -हम अमृत की संतानें हैं। हमारी आध्यात्मिक यात्रा तभी संपन्न होती है जब हम अपनी अनंतता को उपलब्ध हो जाते हैं। अपनी नित्यता हर पल है। अब तो विज्ञान भी कहता है कोई चीज़ बदलती तो है लेकिन रूप बदलने के बाद भी वह रहती तो है। सदा रहती है सदा। तो जो नित्य तत्व है अपराजेय तत्व है ,शाश्वत तत्व है उस तत्व का बोध कराने वाली हमारी यह संस्कृति है। वेदों का एक ही घोष है मनुष्य केवल एक ही काम करे और वह ही उसके लिए आवश्यक है। वह अपने नित्य सनातन स्वरूप का बोध करे। वह भोर में उठकर शुभ संकल्प करे। और वह अपने स्वरूप को उपलब्ध हो। 

हम अपने पाथेय को विस्मृत न कर बैठें। भारतीय संस्कृति यह कहती है अपने स्वरूप को पहचानो  जो अपराजेय है। हमारी संस्कृति देह की मृत्यु की तो बात कहती है पर आत्मा की अमरता का भी सन्देश देती है। कोई ऐसा पदार्थ नहीं है जो मृत्यु के मुंह में न हो। लेकिन हमारी संस्कृति कहती है ,आत्मा नित्य है शाश्वत है। जिस दिन अपने स्वरूप का बोध होता है उस दिन व्यक्ति आनंद से ,अनुराग  से भर उठता है। 

यह कथा ज्ञान की सिद्धि के लिए भी है। यह कथा उपासना के भाव को जागृत करती है। और निष्काम कर्म योग में भी निष्णात करती है। सच तो यह है ,कथा सुनने के बाद हमें अपनी श्रेणी का ,अपनी कोटि का ,अपनी अवस्था का बोध हो जाता है। हम भक्त हैं तो भक्ति सिद्ध होगी। निष्काम कर्म योगी हैं तो सफलता की यहां से प्रेरणा मिलेगी। और यदि हम ज्ञान के उपासक हैं ,अपने स्वरूप के बोध के लिए कथा से  हमें अपार ऊर्जा मिलती है। 

कथा अत्यंत प्राचीन विधा है। इसलिए यह बात कही भी गई है हम श्रवण करें। 

श्रवण मंगलम। 


श्रवण से मांगल्य होता है और श्रवण पहला साधन भी है। जो हमें हमारे स्वभाव ,निजता की ओर लाता है। प्रसंग  इस तरह से आता है ,जब इस धरती पर व्याकुलता बढ़ गई ,उन्माद ,दमन ,अनीति ,अत्याचार ,भंडारण की जब प्रवृत्तियां बहुत प्रचंड हो गईं तब धरती पर कोई युग पुरुष आये और यहां व्यवस्था दे  ,ऐसी मांग बन गई। 

धरा पर बीज नहीं बो सकते आप। उसका फल नहीं ले सकते। तो किसी दैत्य ने पूरी धरती के अधिकार अपने पास अर्जित कर लिए। उसे हिरण्याक्ष कहा गया। जिसका सोने (स्वर्ण )पर ध्यान था ,धरती पर ध्यान था ,जितने भी धरा पर बहुमूल्य पदार्थ हैं ,मेरे हैं। वह ऐसा मानने लगा। 

न केवल धरा ,अग्नि ,वायु ,औषधि सब पर उसके अधिकार थे। आप कल्पना कर सकते हैं ,स्वर्ग में भी उसके अधिकार थे। व्यक्ति की पहली भूख है जिजीविषा। 

मैं राम अवतरण की कथा आरम्भ करूँ उससे पहले मैं व्यक्ति की पहली कामना से परिचय कराना चाहूंगा। जो मनुष्य की पहली कामना है वह जीना है ,जिजीविषा है। 

दूसरी कामना है सुख पूर्वक जीना और तीसरी कामना है -वह अपने अधीन रखना चाहता है सबको। अपनी कीर्ति को अक्षुण रखना चाहता है शीर्षस्थ होना चाहता। अपने मान सम्मान के नित्य विस्तार में रहता है। एक और बात -वह 'स्वयं -भू' होना चाहता है। 

हिरण्याक्ष आये ,हिरण्यकश्यप आये -न सुबह मरूँ न सांझ ,तो मनुष्य की पहली भूख क्या है वह ज़िंदा रहना चाहता है। सुख में वह अनुकूलता चाहता है ,सब मेरे अनुकूल रहें सब मेरे आधीन रहें। 

आदि दैत्य  हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप की कथा ,राम रावण से पहले आती है। 

ये धरती मेरी है यहां का सुख सामान यहां की सम्पदा मेरी है। ऐसी कुछ प्रवृत्तियां पश्चिम की भी हैं वहां तुलसी ,नीम ,बबूल ,पीपल , बिल्व ,हल्दी आदि नहीं होते।  लेकिन इन सब पर पेटेंट चाहते हैं वे। 

यहां जो कुछ भी अलौकिक है वह मेरा हो जाए -इसे आसुरी प्रवृत्ति  कहते हैं। भंडारण की जो प्रवृत्ति है ये आसुरी प्रवृत्ति है। योग पर भी वे अपना पेटेंट चाहते हैं। लेकिन हमारी संस्कृति सबको विश्व -कुटुंब को बांटने की प्रवृत्ति है। वसुधैव कुटुंबकम की संस्कृति है सबको बांटने की संस्कृति है।'होता 'यज्ञ की हरेक आहुति में कहता है यह मेरा नहीं है।यह मेरा नहीं है।  

जिसने अपनी  इन्द्रियाँ को जीत लिया है वही दशरथ प्रवृत्ति है। अंबर में छलांग लगाईं दशरथ ने स्वर्ग की रक्षा के लिए। जो देवताओं से भी न जीती जा सके उस नगरी का नाम अयोध्या है। 

संसार की सबसे प्राचीन नगरी है अयोध्या। पहला मानव इस धरती पर कोई आया है तो वह अयोध्या में आया है।ब्रह्मा के मन में कोई पहली  कामना जगी तो वह यह मैं इसे पूरा करूँ। 

मनु ही धरती पर दशरथ बनकर आएं हैं। हमारी पहली समस्या है -संवाद हीनता। किसी एक ऋषि के मन में यह आया कोई ऐसी व्यवस्था हो जो इस धरती को अभय दे। संवाद दे। 

भंडारण  की आसुरी प्रवृत्ति को पनपने न दे। इस धरती की अराजकता ,शोषण को दूर करने के लिए कोई एक अवतरण होना चाहिए। 

मनु और शतरूपा इसी हेतु आये हैं।पूरी धरती को सुख देने के लिए तप किया गया दोनों के द्वारा -कोई दिव्य पुरुष दिया जाए धरती को जो इस धरती को व्यवस्था दे। ऐसा संकल्प दोनों ने किया। 

अगर भजन ठीक नहीं चल रहा है तो अपना भोजन ठीक करें। आहार शुद्धि ही आपको स्वीकृति अस्वीकृति देगा। हेय  का आप त्याग करेंगे।निंदनीय को छोड़ेंगे ,जो ग्राह्य है वही आप लेंगे। आप जो भी ग्रहण करें उसे पहले भगवान् को समर्पित करें वह प्रसाद बन जाएगा। प्रसाद का अर्थ है प्रसन्नता। 

ये दोनों दैत्य ही- रावण और अह रावण  के रूप में आये। 

राम के अवतरण में मनु शतरूपा का तप है ,और तप तब होता है जब पेट भरा हो ,जब सारे भोग आपने भोग लिए हों जब सारी वस्तुएं आपको प्राप्त हों। जो फटे हाल हैं ,कंगाल हैं ,वे समझ नहीं पाएंगे। ऊंची सौध पर बैठने के बाद ही त्याग किया जा सकता है जिसने उच्च पद प्राप्त कर लिया हो वही त्याग कर सकता है।

वर्धमान ने ,बुद्ध ने ऋषभदेव ने पूरी धरती के सुख प्राप्त करने के बाद संन्यास लिया है। संन्यास कहते हैं सम्यक कामनाओं का न्यास। जिनके पास कुछ है वही संन्यास ले पाते हैं। 

एक दिव्यपुरुष धरती को दिया जाए ,एक नै व्यवस्था पृथ्वी को दी जाए इसके लिए मनु और शतरूपा तप करने बैठे। (ये दोनों ही मानसी सृष्टि थे ब्रह्मा जी की ,जिनके तप से सृष्टि पैदा हुई ,कृष्ण/महाविष्णु  ने चाहा मैं एक से अनेक हो जाऊं और हिरण्यगर्भ ब्रह्मा जी पैदा हो गए उनसे सारी सृष्टि ......  ). 

आहार शुद्धि ,तत्व शुद्धि तप का पहला साधन बतलाया गया है हमारे शास्त्रों में। यदि हम प्रकाश मार्ग पर चलना चाहतें हैं तो पहले आहार शुद्ध करना होगा। जो यह कह रहे हैं हमारा भजन ठीक नहीं चल रहा है जप ठीक नहीं चल रहा है ,हम ध्यानस्थ नहीं हो पाते हैं ,एकाग्र नहीं हो पाते हैं चित्त में एकाग्रता और स्थिरता नहीं रहती तो यह ध्यान रहे वह अपना भोजन ठीक करें। जो आपकी थाली में रखा है बस वही आप बनने वाले हैं आहार ही आपको आकार देगा। आहार ही आपको विचार देगा ,वृत्तियाँ ,प्रवृत्तियां देगा। आहार में ही एक स्वीकृति अस्वीकृति पैदा होगी यह ध्यान रहे। 

आहार आपका शुद्ध है तो आप त्याग करना चाहते हैं। वह ग्रहण करना चाहते हैं जो शुद्ध है जो हेय है भयकारक है आप उसका त्याग करना चाहते हैं। 

आहार यदि आपका शुद्ध नहीं है तब आप ऐसा आहार करना चाहते हैं जो विष है निंदनीय है।पूरे संसार में अगर आहार शुद्धि की चर्चा हो रही है तो केवल भारत में। 

आहार मितभोजी होना चाहिए उसमें मात्राज्ञता  होनी चाहिए। कितनी मात्रा में लिया जाए ?आहार सुपाच्य होना चाहिए।आहार आपका प्रसाद बन जाए। प्रसाद माने प्रसन्नता।  आप पहले भगवान् को आहार समर्पित करें  फिर वह प्रसाद बन जाएगा। 

करहिं आहार शाक फल कंदा, 

 सुमरहिं ब्रह्म सच्चिदानंदा। 

उर अभिलाष निरंतर होई ,

देखहुँ नैन परम प्रभु सोही। 

वेद में वीर्य के पावित्र्य , रज शुद्धि की विधि बताई है।के कितनी पीढ़ी में रक्त ,धातुएं ,मैद ,रुधिर ,वीर्य ,मज्जा ,रस ,प्राण ,विचार ,मति ,संकल्प पवित्र हो , शुद्ध हो जाएंगे।एक गर्भाधान करने में मनु शतरूपा को  बारह बरस लग गए। बारह बरस तक लगातार एक तप किया मनु और शतरूपा ने। एक व्रत किया पहले।मन पर काम किया उन्होंने ,विचार पर काम किया। ये सब उत्तम कोटि की संतान के लिए किया। हम ओस की एक बूँद की तरह स्वाभाविक हो जाएँ। आकाशगंगा में वह जो दूधिया सागर है वैसे सहज हो जाएँ।धवल चादर से हम सहज हो जाएँ।  जिस दिन सिंह हमारे पास आकर बैठ जाएगा ,हमें डर नहीं लगेगा -इसके लिए अन्न की साधना की ,विचार की साधना की। 

भोजन देखने में  ग्राहीय लगे।वरना अन्न में बड़ी दुर्गन्ध है। 

अन्न औषधि है केवल भूख मिटाने के लिए नहीं है आपके अंदर एक कांति ,एक ओज आपके अंदर पैदा हो। अन्न में उन्माद न हो। उत्तेजना न हो। थाली ब्रह्म को अर्पण हो जाए। अन्न को नैवेद्य ,ईश्वरीय पदार्थ बनाइये और यह काम इन दोनों ने किया। 

अन्न से एकाग्रता आती है। निर -विचार ,निर -वितर्क अवस्था आती है। वीर्य ,रज ,अस्थि , मज़्ज़ा  सब शुद्ध कर लिए मनु शतरूपा ने । तब भगवान् ने कहा जाइये मैं आपके यहां आऊंगा। आप त्रेता युग में दशरथ और कौशल्या  होंगें। आपको ही मैं चुनूंगा माता पिता के रूप में। 

पार्वती परमात्मा को कुरेदना जानतीं हैं उन्होंने कितने प्रश्न किये -गुरु से प्रश्न किये लोक कल्याण के लिए ,जन चेतना के लिए ,आपको गुरु से प्रश्न करना आना  चाहिए पार्वती की तरह। 

पार्वती  कहतीं हैं - हमने सुना है नारद ने भगवान् को शाप दिया था। शाप तो क्रोध में ही दिया जाता है जब शरीर के अंदर विष बढ़ जाता है तब क्रोध आता है । क्रोध बिना काम के आ ही नहीं सकता ,तो क्या नारद ने क्रोध किया  शाप देने से पहले। जब व्यक्ति विचार शून्य हो जाता है तब क्रोध करता है। वह स्वयं पर नियंत्रण खो बैठता है तब क्रोध करता है।  जिसका अभ्यास सफल नहीं हुआ है वह क्रोध करता है। 

नारद के शाप के कारण भगवान नारायण (राम )बनकर आये। नारद ने इतना क्रोध क्यों किया मुझे बताइये। दमित काम जब प्रकट होता है तब क्रोध आता है। नारद के भीतर ऐसा क्या था ?मुझे बताइये प्रभु -कहतीं हैं पार्वती शिव से। 
(ज़ारी ....)  

क्रोध आ ही नहीं सकता काम के बिना। काम की कोख से ही क्रोध निकलता है। अगर कोई व्यक्ति क्रोध कर रहा हो तो समझ लेना यह वह व्यक्ति है जो हारा हुआ है। इसका अभ्यास सफल नहीं हुआ है। 

पार्वती शिव से कहने लगीं -हे देव हम ने सुना है नारद के भयानक शाप के कारण नारायण राम बन के आये। तो क्या कारण रहा नारद को इतना क्रोध आया ,उन्हें शाप देना पड़ा ?

क्रोध की तीन अवस्थाएं हैं :

(१ )जब आप ज्ञान शून्य हैं ,विचार शून्य हैं 

(२ )जब आप अपनी वासनाओं में लालसाओं में मनोवांछाओं में असफल हो गए हैं तो क्रोध आता है 

(३)दमित काम का बीज जो हमारे अंदर होता है और जो कभी हमें दिखाई ही  नहीं दिया ,जब वह प्रकट होता है तब क्रोध आता है। 

भाव की अधम अवस्था का नाम क्रोध है जब व्यक्ति स्वयं -भू ,परि -भू होना चाहता है सबको अपने अधीन रखना चाहता है शीर्षस्थ होना चाहता है। मैं ही मैं हूँ ,दूसरा कोई नहीं। 

भाव की सर्वोच्च अवस्था का नाम भक्ति है। 

भाव की जो पवित्रतम अवस्था है उसका नाम तो भक्ति है। और भाव की जो नि-कृष्ठ जो अवस्था है उसका नाम क्रोध है। यह क्रोध तभी प्रकट होगा जब अनियंत्रत ,डिस्प्रोपोशनेट (असमानुपाती )काम आपके भीतर है।

काम बुरी चीज़ नहीं है मैं और आप काम की ही उत्पत्ति हैं। काम से ही यह जगत है। बिना काम के जगत का विस्तार नहीं हो सकता। लेकिन डिस्प्रोपोशनेट काम का फलादेश है क्रोध। 

एक बहुत ही  उदण्ड मन अराजक मन की कथा सुनाते हैं आपको।जो यह प्रकट करता है मैं बड़ा शिष्ट हूँ लेकिन भीतर की कामना कैसे जागतीं हैं -बड़ा सुंदर चित्र है उसका इस कथा में। 

"हे गुरु नारद मैं आपको प्रणाम करता हूँ ,आप ने मुझे हरा दिया ,शिव मुझसे लड़ के जीत नहीं सके अपनी शक्ति से भगवद्ता से उन्होंने मुझे भस्म ज़रूर कर दिया  लेकिन आप ने तो मुझे जीत लिया मैं आपको प्रणाम करता हूँ। इन्द्रादि सनकादि कुमार यक्ष आदि सब नारद की जय जैकार करने लगे। अरे ब्रह्मा ने तो सरे आम अपनी पुत्री सरस्वती का हाथ पकड़ लिया था कामासक्त होकर और इसीलिए आज तक ब्रह्मा की कहीं पूजा नहीं होती एकाध ही मंदिर है ब्रह्मा जी का भारत में। लेकिन । आप ने तो ऋषिवर मुनिवर मुझे निस्तेज कर दिया-बोला काम नारद से। " 

आज तक भी विश्व में कोई इसलिए यश का भागी नहीं हुआ के उसने अर्थ बहुत अर्जित कर लिया ,यश जिसको भी मिला है त्याग से मिला है तप से मिला है। ऋषियों ने कहा हम ने पहली बार कोई तप देखा जिसमें स्वाभाविक विरति है उपरति है। संसार के लिए कोई आकर्षण नहीं रहा इस तरह से संसार भीतर से खो गया है  . हम ने पहली बार कोई साधु देखा है। सबने नारद का गुणगायन किया। 

संसारी और साधु  का फर्क देखिये -  संसारी संसार में रहता है उसके भीतर भी एक संसार रहता है। साधु संसार में रहता है और उसके भीतर में संसार नहीं रहता। तो जिसके भीतर की सांसारिकता ,पारिवारिकता खो गई है बस वही साधु है। ऐसा कहकर पूरी देव सत्ता अप्सराएं नमित होने लगीं नारद के समक्ष । और ब्रह्मा ने भी उनका (नारद )का वंदन किया। ब्रह्मा जी यह कहकर प्रणाम करने लगे -मैं काम जीत नहीं सका और जय जैकार नारद की सारी धरती पर हो गई। सब उनका सम्मान करके जा रहे थे अकेले ब्रह्मा रह गए। ब्रह्मा ने नारद के कान में कहा शब्द ,स्पर्श ,रूप ,रस ,गंध -मैं छू कर देखूँ ,सूंघकर ,चख कर देखूं  आदि इन सब पर मेरा कोई नियंत्रण नहीं रहा। देखने की कामना पर मेरा कोई नियंत्रण नहीं रहा। तूने कर लिया। जो मैं नहीं कर सका वह तूने किया। 

ये जो तेरी जय जैकार है इसकी भनक ,इसका समाचार शिव को न मिले -ध्यान रखना ,अच्छा नहीं लगेगा ब्रह्मा जी ने नारद को कहा। मैं तेरा पिता हूँ इस वर्जना का पालन करना। यहां पर यही सन्देश है कथा का -माता पिता कोई वर्जना दें तो उसका पालन करना। शिव काम को जीत न सके थे भस्म ज़रूर कर दिया था उन्होंने काम को अपनी सामर्थ्य से। 

मनुस्मृति में एक ही दृष्टि आई है -ज्येष्ठ जनों की आज्ञा का पालन ही धर्म है। ज्येष्ठजन जो परम्परा हैं उनकी आज्ञा का पालन करना ही धर्म है। 

नारद ने अवज्ञा की। इसका अर्थ है धर्म का उल्लंघन कर दिया। कीर्ति की भूख उन्हें शिव के द्वार पर ले गई। पहुंचे ये कहने मेरे पिता ने तो वर्जना दी हैं उन्होंने तो मना किया है लेकिन आप मेरे गुरु हैं ,अपनी कृति ,अपनी निर्मिति बताने के लिए नारद बे -चैन हैं उस बाज़ीगर की तरह जो  डुगडुगी बजाकर सारी दुनिया को तमाशा दिखाना चाहता है। अपने हाथ की सफाई दिखाना चाहता है। 

शिव अपनी तपस्या कभी भंग नहीं करते लेकिन आज वह नारद की स्तुति गुण -गायन  कर रहे हैं तपस्या से समाधि से बाहर आकर। नारद को ऊंचे आसन पर बिठाया जा रहा है रूद्र लोक में। पार्वती हैरान है यह नारद तो यहां अक्सर आता है ,आज ऐसी क्या घटना घटी है जो इसका इस प्रकार अभिषेक किया जा रहा है। श्रृंगी आदि सभी हाथों में पुष्प लिए खड़े हैं नारद के अभिवादन के लिए। शिव ने प्रार्थना की हम विजेता को नमन करते हैं। 

काम के जनक नारायण हैं उनमें ही पहली कामना पैदा हुई मैं एक से अनेक हो जाऊं। काम पर नारायण का नियंत्रण होता है। उसी के नाभि कमल से पैदा हुए ब्रह्मा वह पहला काम उसी नारायण में पैदा हुआ। काम से विलगता ,निष्काम होना काम से केवल नारायण को आता है। 

अगर काम से विलग हो गया है नारद तो क्या नारायण हो गया नारद ?

और अगर नारद नारायण हो गया है तो इसे प्रणाम करना चाहिए। इसलिए वंदन करने लगे। अगर अपने पतन का फाटक खोलना है तो बड़ों का आदर स्वीकार करने लगें। अगर उच्च पदस्थ व्यक्ति आपका आदर करने लगे और आपको वह अच्छा लगने लगे तो समझ लेना आपके पतन के द्वार खुल गए हैं। 

बड़ो से आदर कभी मत लेना क्योंकि बड़ों से आदर लेकर जो आपको सुख मिल रहा है उसे शास्त्रों में अधम सुख कहा गया है। 

नारद उच्च आसन पर बैठ गए। शिव निकट आये और उन्होंने कान में एक बात कही -अब मैं प्रार्थना ही कर सकता हूँ नारद अब मैं आदेश तो दे नहीं पाऊंगा क्योंकि मैं तेरा गुरु हूँ ,अब तू वो सारी मर्यादाएं लांघ गया क्योंकि मेरे द्वारा पूजित होकर तुझे सुख मिल रहा है। मैंने तुझे प्रणाम किया ,पुष्प  दिया ,उच्च आसन दिया तो मेरे द्वारा दिए गए उच्च आसन पर बैठकर तुझे बड़ा सुख मिल रहा है। इसका अर्थ है अब तू आदेश तो मानेगा नहीं। उपदेश अब तू स्वीकार नहीं करेगा। तो विनय करता हूँ मैं। 

एक मेरी विनय मान लेना ,नारद बोला क्या विनय है -बोले शिव नारद से -

ये जो समाचार तू ने मुझे दिया है के मैंने काम को जीत लिया ,क्रोध को जीत लिया ये नारायण को मत बताना। बस यही एक विनय है मेरी। ये समाचार आप नारायण के द्वार तक मत ले जाना के मैं स्वयं -भू हो गया हूँ ,परि -भू हो गया हूँ। काम नियंत्रक नियोक्ता हो गया हूँ मैंने काम जय कर ली है। अब मुझे कोई सांसारिक आकर्षण नहीं रहता यह समाचार उन्हें मत बताना। 

बार -बार विनवो (विनवहुँ )मुनि तोहि ,
ये जो कथा सुनाई मोहि।

एक अनियंत्रत मन उस समय हो जाता है जब अधिक आदर मिले ,आदमी ने अपनी परम्परा का एक -एक संवेदन समेट कर रखा है यहां तो गुरु भी हैं स्वयं ईशवर भी हैं फिर भी नारद में अहंकार है।  

ईश्वर अंश जीव  अविनाशी ,

चेतन अमल सहज  सुख राशि। 

ईश्वरीय अंश है हमारे अंदर (हम आत्मा है )जिसको बहुत आदर चाहिए।नारद को यह बात अच्छी नहीं लगी। 

मैं जाऊंगा -एक बार भगवान को पता तो लगे के भक्त की क्या उपलब्धि हैं। नारद पहुंचे और भगवान नारद से कहने लगे हे मुनि तूने बड़ा अनुग्रह किया मुझ पर आज तो मेरे आसन पर ही बैठना पड़ेगा। नारायण खड़े हो गए आसन छोड़कर। 

जिसमें इतना वैराग्य है उस शेषनाग की काया पर नारद बैठते हैं। लक्ष्मी ने कहा यह हो नहीं सकता  इसने काम को जीत लिया। इसमें यश की अभिलाषा बैठी है।
"ये नया कोई लोक है। ये मेरी कन्या है इसे वर चाहिए -और उस मायावी पुरुष  ने अपनी मायावी कन्या का हाथ माया मुक्त नारद के हाथ पर जैसे ही रखा नारद माया वश स्वयं हो गए। "

वह त्रिदेव पर शासन करने वाला होगा जो इसका वर होगा ,नारद सोचने लगे ये कन्या मुझे मिल जाए तो मैं तीनों लोकों का मालिक  हो जाऊँ। 

मेरी कन्या की एक ही शर्त है यह सुंदर पुरुष चाहती है जिसका सौंदर्य  छीज़ न जाए। जन्म ,विकास ,ह्रास (क्षय )और मृत्यु इस सृष्टि का नियम है। 
युवक को कभी यह पता नहीं लगता के प्रौढ़ता आ गई है। अब वह युवक नहीं रहा। ये आकर्षण कुछ देर का है फिर ह्रास है जिसमें कुछ लोग संतुलन खो बैठते हैं। नारद उसे अपनी पत्नी माने बैठे हैं ये मेरी बन गई तो मैं स्वयं -भू बन जाऊंगा। नारद को काम ने नहीं जीता -कीर्ति की भूख ने जीत लिया। मैं सृष्टि का मालिक बन जाऊं। 

जिसकी सुंदरता कभी खंडित न हो ,जिसमें आकर्षण कभी खो न जाए ऐसे पुरुष से विवाह करेगी मेरी पुत्री।मायावी नगरी का मायावी राजा (वास्तव में विष्णु )बोला नारद से।  

नारद मन ही मन सोचने लगे मैं पूर्ण नहीं हूँ पूर्ण तो नारायण  हैं क्यों न उनसे ये सारे गुण ये रूप  सौंदर्य मांग लूँ। 

आजकल लोगों को वेलनेस बिजनिस बड़ा सता  रहा है ये बात सता रही है    मेरा आकर्षण बना रहे।अब पदार्थ मुझे खींच रहें हैं उस काया ने मुझे क्यों वशीभूत कर लिया है मैं ये नहीं जानता मेरे अंदर ये हलचल क्यों हैं लेकिन मुझे अपना रूप दे दो जिससे मेरा कल्याण हो। 

अत्यंत विषयासक्त प्राणी बहुत सुन्दर नहीं रहता -याचक का चेहरा उतरा हुआ रहता है। साफ़ पता चलता है कुछ उधार मांगने आया है। जिस दिन आप अंतर्मुख होते हैं उस दिन आप सुन्दर दीखते हैं ,आपके अंदर से विषयासक्ति खो जाती है बहिर्मुख व्यक्ति सुंदर हो ही नहीं  सकता। 

इस विषय वासना ने नारद का रूप छीन लिया वह बंदर जैसे दिखने लगे। अश्वपति से उसने कहा मैं लड़का (वर )देख आईं हूँ। काल के गाल में से सावित्री अपने पति को छीन लाई। 

पावित्र्य हमारे मन को छूता है आकर्षित करता है जो  एकांत  के शील को  सुरक्षित रखता है। नारद को बंदर रूप देख वह मायावी सुन्दर कन्या हट गई। विष्णु का वरण कर लिया। 

नारद बोले तू सदा से ही छलिया रहा है -जा मैं तुझे सज़ा देता हूँ शाप देता हूँ -तू भी कभी अपनी स्त्री को जंगल दर जंगल ढूंढता फिरेगा राम के रूप में। मुझसे भी तूने छल ही किया अपना रूप देकर नाटक क्यों किया। 

अगर दुःख घेर लें तो भगवान् के गुणों का ध्यान करें। भगवान् ने कहा नारद अरे तेरा मन ठीक नहीं है। नारद शिव का ध्यान करने लगे। चित्त शांत हो गया नारद का। 

शिव शिव शम्भु शंकरा ,
हर हर हर महा -देवरा।    

नम :शिवाय नमःशिवाय ,

शिव शिव शम्भु नम :शिवाय। 
   

सन्दर्भ -सामिग्री :

(१)https://www.youtube.com/watch?v=_1UZvf4IGu8

(२ )

LIVE - Shri Ram Katha by Shri Avdheshanand Giri Ji - 27th Dec 2015 || Day 2