रविवार, 9 दिसंबर 2018

देख लो भैया गौर से इस काले कौवे को , जैसा इसका रूप हैं वैसी ही करतूतें

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देख लो भैया गौर से इस काले कौवे को , 

जैसा इसका रूप हैं वैसी ही करतूतें।


राजनीति के ये 'केतु' हैं ,'राहु' अपने राहुल भइया ,

 अपभाषा में माहिर हैं ,दोनों ही ये मरदूदे। 


देख लो भैया गौर से इस काले कौवे को , 

जैसा इसका रूप हैं वैसी ही करतूतें।


राजनीति के ये 'केतु' हैं ,'राहु' अपने राहुल भइया ,
पभाषा में माहिर हैं ,दोनों ही ये मरदूदे। 

असत्यानन्द कहो दोनों को ,
राजनीति के इब्न बतूते। 

छद्म भेष धारे हैं दोनों ,
जाने किस- किस के बलबूते। 


बात बनाने में प्रवीण हैं ,
कटी न ऊँगली पर ये मूतें। 


राजनीति के भूत न भागें ,

बिना लात सिर पे सौ जूते। 



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Virendra Sharma बहुत नहीं सिर्फ़ चार कौए थे काले,
उन्होंने यह तय किया कि सारे उड़ने वाले
उनके ढंग से उड़े,, रुकें, खायें और गायें
वे जिसको त्यौहार कहें सब उसे मनाएं

कभी कभी जादू हो जाता दुनिया में
दुनिया भर के गुण दिखते हैं औगुनिया में
ये औगुनिए चार बड़े सरताज हो गये
इनके नौकर चील, गरुड़ और बाज हो गये.

हंस मोर चातक गौरैये किस गिनती में
हाथ बांध कर खड़े हो गये सब विनती में
हुक्म हुआ, चातक पंछी रट नहीं लगायें
पिऊ-पिऊ को छोड़े कौए-कौए गायें

बीस तरह के काम दे दिए गौरैयों को
खाना-पीना मौज उड़ाना छुट्भैयों को
कौओं की ऐसी बन आयी पांचों घी में
बड़े-बड़े मनसूबे आए उनके जी में

उड़ने तक तक के नियम बदल कर ऐसे ढाले
उड़ने वाले सिर्फ़ रह गए बैठे ठाले
आगे क्या कुछ हुआ सुनाना बहुत कठिन है
यह दिन कवि का नहीं, चार कौओं का दिन है

उत्सुकता जग जाए तो मेरे घर आ जाना
लंबा किस्सा थोड़े में किस तरह सुनाना ?
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